जब सती बनीं शैलपुत्री
माँ शैलपुत्री: शक्ति, भक्ति और विश्वास का प्रथम स्वरूप
नवरात्रि के शुभ अवसर पर माँ दुर्गा के नौ रूपों की पूजा की जाती है, और इस पावन पर्व की शुरुआत माँ शैलपुत्री की आराधना से होती है। हिमालय की पुत्री होने के कारण इन्हें शैलपुत्री कहा जाता है। इनके एक हाथ में त्रिशूल और दूसरे में कमल सुशोभित है, और वृषभ पर विराजित यह देवी भक्तों को साहस, धैर्य और प्रेम का आशीर्वाद देती हैं। माँ शैलपुत्री केवल शक्ति की अधिष्ठात्री ही नहीं, बल्कि करुणा और भक्ति की मूर्ति भी हैं।
जब सती बनीं शैलपुत्री
कहते हैं, प्रेम में अपमान सबसे बड़ा दुःख होता है। यही दुःख देवी सती के हृदय को भी चीर गया था।
प्रजापति दक्ष ने एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया था। उन्होंने सारे देवी-देवताओं को आमंत्रित किया, परंतु भगवान शिव को न्योता तक नहीं भेजा। सती यह समझ रही थीं कि यह उनके पति का अपमान है, फिर भी मन में एक आस थी—शायद भूल से न्योता न गया हो, शायद पिता का हृदय बदल जाए। उन्होंने भगवान शिव से यज्ञ में जाने की अनुमति मांगी। शिव जानते थे कि वहाँ सती का अपमान होगा, इसलिए उन्होंने मना किया। लेकिन सती का मन व्याकुल था—कैसे न जाती? यह तो उनके पिता का घर था! अंततः, भगवान शिव ने अनुमति दे दी।
जब सती अपने मायके पहुँचीं, तो वहाँ का वातावरण कठोर और तिरस्कार से भरा था। न कोई प्रेम भरा आलिंगन, न कोई मधुर शब्द। बहनों की व्यंग्य भरी हँसी, पिता की रूखी बातें और सभा में बैठे लोगों की ठंडी दृष्टि—यह सब उनके हृदय को छलनी कर रहा था। लेकिन सबसे बड़ा आघात तब लगा जब स्वयं उनके पिता, प्रजापति दक्ष ने भगवान शिव का अपमान करना शुरू कर दिया।
सती की आँखों में आँसू थे, लेकिन ये आँसू कमजोरी के नहीं थे—वे क्रोध, वेदना और अपमान के आँसू थे। उनका हृदय चीत्कार कर उठा—क्या यही मेरा परिवार है? क्या यही मेरा मायका है, जहाँ न मेरे पति का मान है, न मेरा?
क्षण भर में उन्होंने निर्णय ले लिया। अपमान की इस अग्नि को वे सहन नहीं कर सकती थीं, इसलिए स्वयं को यज्ञ की अग्नि में समर्पित कर दिया।
जब यह समाचार भगवान शिव तक पहुँचा, तो वे शोक और क्रोध से भर उठे। उनकी तांडवी ज्वाला में समस्त संसार थर्रा उठा। उन्होंने अपने गण वीरभद्र को भेजकर यज्ञ का विध्वंस कर दिया और दक्ष का संहार कर दिया। लेकिन यह कहानी यहीं समाप्त नहीं हुई। यह तो एक नई शुरुआत थी—सती ने हिमालय के घर जन्म लिया और शैलपुत्री के रूप में प्रतिष्ठित हुईं।
समय बीता, और पुनः उन्होंने कठोर तपस्या कर भगवान शिव को प्राप्त किया। यही शैलपुत्री आगे चलकर माँ पार्वती बनीं, जगजननी बनीं, और शिव की अर्धांगिनी
माँ शैलपुत्री का यह दिव्य मंत्र भक्तों के जीवन में शक्ति, भक्ति और समृद्धि का संचार करता है—
या देवी सर्वभूतेषु शैलपुत्री रूपेण संस्थिता
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:
शिवरूपा वृष वाहिनी हिमकन्या शुभंगिनी
पद्म त्रिशूल हस्त धारिणी रत्नयुक्त कल्याणकारिणी
ओम् ऐं ह्रीं क्लीं शैलपुत्र्यै नम:
माँ शैलपुत्री केवल शक्ति की देवी नहीं, बल्कि भक्ति और प्रेम की साकार मूर्ति हैं। उनके चरणों में सच्चे मन से की गई प्रार्थना कभी व्यर्थ नहीं जाती। इस नवरात्रि, माँ का आशीर्वाद हम सब पर बना रहे, और उनके प्रेम, करुणा और शक्ति से हमारा जीवन प्रकाशित हो।
जय माँ शैलपुत्री!
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