पुण्यों का मोल
पुण्यों का मोल
एक व्यापारी था, जो जितना धनी था, उतना ही दान-पुण्य में भी आगे रहता था। वह सदैव यज्ञ-पूजा और धार्मिक कार्यों में संलग्न रहता।
लेकिन एक दिन ऐसा आया जब उसने एक विशाल यज्ञ में अपना सब कुछ दान कर दिया। अब उसके पास परिवार चलाने के लिए भी धन न बचा।
पत्नी का सुझाव
पत्नी चिंता में पड़ गई। उसने कहा,
“अब घर में अनाज तक नहीं बचा। कुछ सोचना होगा।”
व्यापारी ने धीरे से कहा, “मैंने सब कुछ धर्म-कर्म में लगा दिया। अब तो बस ईश्वर का सहारा है।”
पत्नी ने एक उपाय सुझाया, “पड़ोस के नगर में एक सेठ हैं, जो पुण्य खरीदते हैं। आप उनके पास जाइए और अपने कुछ पुण्य बेचकर धन ले आइए। कम से कम घर का खर्च तो चलेगा!”
व्यापारी अचरज में पड़ गया, “पुण्य भी कोई बेचने की चीज़ है?”
पत्नी बोली, “और कोई उपाय है क्या?”
व्यापारी के मन में यह विचार अजीब लग रहा था, लेकिन बच्चों के भूख से बिलखते चेहरे याद आए तो उसकी आत्मा कांप उठी। वह तैयार हो गया।
पत्नी ने जाते समय चार रोटियाँ बाँध दीं और कहा, “रास्ते में भूख लगे तो खा लेना।”
कुतिया और उसकी संतान
लंबी यात्रा के बाद व्यापारी नगर के समीप पहुँचा। भूख के मारे पेट में चूहे दौड़ रहे थे। उसने सोचा, “नगर में प्रवेश करने से पहले भोजन कर लूँ।”
जैसे ही उसने रोटियाँ निकालीं, एक दुबली-पतली कुतिया अपने तीन नवजात शावकों के साथ उसके पास आ खड़ी हुई।
कुतिया भूख से हाँफ रही थी। व्यापारी को उस पर दया आ गई। उसने एक रोटी उसकी ओर बढ़ा दी।
कुतिया झटपट रोटी खा गई, लेकिन उसकी आँखों में अभी भी भूख झलक रही थी।
“अरे! यह तो बहुत भूखी है,” व्यापारी ने सोचा और दूसरी, फिर तीसरी, और फिर चौथी रोटी भी उसे खिला दी।
अब व्यापारी के पास खाने को कुछ नहीं था। उसने केवल पानी पिया और सेठ के घर की ओर बढ़ गया।
सेठ के पास प्रस्ताव
व्यापारी सेठ के पास पहुँचा और कहा, “मैं अपना पुण्य बेचने आया हूँ।”
सेठ ने बिना देखे ही जवाब दिया, “अभी व्यस्त हूँ, शाम को आना।”
सेठ जब भोजन के लिए घर पहुँचा, तो उसने अपनी पत्नी से चर्चा की, “एक व्यापारी आया था, जो अपना पुण्य बेचना चाहता है। कौन-सा पुण्य खरीदूँ?”
सेठ की पत्नी सिद्ध तपस्विनी थी। उसने ध्यान लगाया और कहा, “आज उस व्यापारी ने सबसे बड़ा पुण्य अर्जित किया है। उसने एक भूखी कुतिया को भोजन कराया है। वही पुण्य खरीदिए!”
पुण्य का मूल्यांकन
शाम को व्यापारी फिर से आया।
सेठ ने कहा, “मैं आज आपके सबसे श्रेष्ठ पुण्य का सौदा करना चाहता हूँ।”
व्यापारी हँस पड़ा, “आज मैंने कोई यज्ञ नहीं किया। अगर मेरे पास धन होता, तो मैं पुण्य बेचने क्यों आता?”
सेठ मुस्कुराया, “मैं यज्ञ की बात नहीं कर रहा। मैं उस पुण्य की बात कर रहा हूँ, जो आपने एक भूखी कुतिया को भोजन कराकर कमाया है।”
व्यापारी चौंक गया, “तो इसे भी पुण्य कहते हैं?”
सेठ ने कहा, “यह तो सबसे बड़ा पुण्य है। इसके बदले मैं आपको चार रोटियों के वजन के बराबर हीरे-मोती दूँगा।”
हीरे-मोती का तराजू
एक पलड़े में चार रोटियाँ रखी गईं और दूसरे में हीरे-मोती। परंतु हीरे-मोती रखने के बावजूद पलड़ा हिला तक नहीं।
सेठ ने दूसरी पोटली भरकर रखी, फिर भी कोई बदलाव नहीं।
“अजीब बात है!” सेठ ने कहा।
व्यापारी को यह देखकर कुछ अजीब सा महसूस हुआ।
सेठ ने कई और पोटलियाँ रखीं, लेकिन तराजू का संतुलन नहीं बदला।
अंततः व्यापारी ने कहा, “सेठजी, मैंने विचार बदल दिया है। मैं अब पुण्य नहीं बेचूँगा।”
कंकड़ से हीरे तक
खाली हाथ लौटते समय, जहाँ उसने कुतिया को रोटियाँ खिलाई थीं, वहाँ से कुछ कंकड़-पत्थर उठाए और अपनी थैली में रख लिए।
घर पहुँचते ही पत्नी ने पूछा, “पुण्य बेचकर कितने पैसे मिले?”
व्यापारी ने थैली पत्नी को थमाते हुए कहा, “इसे रात के भोजन के बाद खोलेंगे।”
पत्नी को धैर्य नहीं हुआ। उसने थैली खोली और उसकी आँखें आश्चर्य से फटी रह गईं—थैली बेशकीमती हीरे-जवाहरातों से भरी थी!
ईश्वर की परीक्षा
जब व्यापारी लौटा, तो पत्नी ने पूछा, “इतने बहुमूल्य रत्न किसने दिए?”
व्यापारी को संदेह हुआ कि पत्नी क्रोधित तो नहीं, परंतु उसके चेहरे की चमक देखकर वह निश्चिंत हो गया। उसने सारा वृत्तांत पत्नी को सुना दिया।
पत्नी को पछतावा हुआ कि उसने अपने पति को पुण्य बेचने के लिए विवश किया था।
व्यापारी ने मुस्कुराते हुए कहा, “अब समझ आया कि असली पुण्य क्या होता है?”
पत्नी ने सिर झुकाकर कहा, “हाँ, और अब मैं ईश्वर की परीक्षा में कभी असफल नहीं होऊँगी।”
दोनों ने मिलकर निर्णय लिया कि इस धन का कुछ भाग व्यापार में लगाएंगे और शेष को लोककल्याण में अर्पित करेंगे।
शिक्षा
ईश्वर जब परीक्षा लेता है, तो वह उसी गुण की परीक्षा लेता है, जिस पर हमें सबसे अधिक गर्व होता है। यदि हम सफल होते हैं, तो ईश्वर वह गुण हमें वरदानस्वरूप दे देते हैं। और यदि असफल होते हैं, तो वह किसी और योग्य व्यक्ति की खोज में लग जाता है।
इसलिए, जीवन में कितनी भी कठिनाइयाँ आएँ, हमें ईश्वर में अडिग विश्वास रखते हुए सन्मार्ग पर चलना चाहिए। कौन जाने, कब आपके भी कंकड़-पत्थर अनमोल रत्न बन जाएँ!
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