क्यों नहीं बचाया भगवान श्री कृष्ण ने वीर अभिमन्यु को
क्यों नहीं बचाया भगवान श्री कृष्ण ने वीर अभिमन्यु को?
महाभारत के युद्ध में वीर अभिमन्यु की शहादत एक ऐसा प्रसंग है जो अनगिनत लोगों के मन में प्रश्न उत्पन्न करता है – यदि भगवान श्री कृष्ण सर्वशक्तिमान थे, त्रिकालदर्शी थे, तो उन्होंने अभिमन्यु को बचाया क्यों नहीं? इस प्रश्न का उत्तर समझने के लिए हमें कर्म, नियति और ईश्वर के कार्यकलापों को गहराई से समझना होगा।
ईश्वर और व्यक्ति के कर्म
भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में स्पष्ट रूप से कहा है कि व्यक्ति के कर्मों पर किसी का वश नहीं होता। प्रत्येक व्यक्ति अपने कर्मों के अनुसार फल प्राप्त करता है। ईश्वर केवल मार्गदर्शन कर सकते हैं, सही और गलत का भेद समझा सकते हैं, लेकिन वे किसी की नियति में हस्तक्षेप नहीं करते। इसी कारण उन्होंने महाभारत के कई महत्वपूर्ण क्षणों में भी हस्तक्षेप नहीं किया।
अभिमन्यु का बलिदान न केवल युद्ध का एक महत्वपूर्ण मोड़ था, बल्कि यह एक संदेश भी था कि धर्म की रक्षा के लिए महापुरुष भी अपने प्राणों की आहुति देते हैं। यदि श्रीकृष्ण चाहते, तो वे अभिमन्यु को बचा सकते थे, परंतु उन्होंने ऐसा नहीं किया क्योंकि यह नियति का लेख था और धर्म की पुनर्स्थापना के लिए आवश्यक भी।
अभिमन्यु का दिव्य जन्म
धर्म की रक्षा के लिए भगवान विष्णु ने श्रीकृष्ण के रूप में अवतार लिया था, और उनके साथ कई देवताओं ने भी विभिन्न योद्धाओं के रूप में जन्म लिया। चंद्रदेव के पुत्र वर्चा ने अभिमन्यु के रूप में अवतार लिया था। जब देवताओं ने वर्चा को पृथ्वी पर भेजने की इच्छा व्यक्त की, तो चंद्रदेव ने कहा,
“मैं अपने प्रिय पुत्र को पृथ्वी पर भेजना नहीं चाहता। परंतु धर्म की स्थापना के लिए इसे वहां जाना होगा। किंतु मेरी एक शर्त है – यह लंबे समय तक वहाँ नहीं रहेगा। यह अर्जुन का पुत्र बनेगा, और अपनी अल्पायु में भी ऐसा पराक्रम दिखाएगा जिससे समस्त योद्धा चकित रह जाएँगे। एक दिन वह चक्रव्यूह भेदन कर युद्ध करेगा और संध्या होते ही मुझसे आ मिलेगा।”
इस प्रकार, चंद्रमा के वचन के अनुसार, अभिमन्यु को अल्पायु में वीरगति प्राप्त होनी ही थी।
अभिमन्यु का पराक्रम और उसकी नियति
अभिमन्यु केवल सोलह वर्ष का था, लेकिन उसकी वीरता अपार थी। उसने अकेले ही कौरवों के चक्रव्यूह में घुसकर महायोद्धाओं को परास्त किया। उसकी वीरता इतनी अद्भुत थी कि युद्धभूमि में उपस्थित सभी योद्धा चकित रह गए।
किन्तु नियति अपने पथ से नहीं हटती। चक्रव्यूह में प्रवेश करने के बाद अभिमन्यु को बाहर निकलने का ज्ञान नहीं था, क्योंकि उन्होंने केवल प्रवेश की विधि ही सीखी थी। अपने पिता अर्जुन और चाचा श्रीकृष्ण की अनुपस्थिति में, वह अकेले ही युद्ध करता रहा और अंततः कौरवों के षड्यंत्र का शिकार हो गया।
श्रीकृष्ण का हस्तक्षेप न करना
श्रीकृष्ण चाहते तो अपने दिव्य सामर्थ्य से अभिमन्यु को बचा सकते थे, परंतु उन्होंने ऐसा नहीं किया क्योंकि यह नियति के विरुद्ध होता। चंद्रदेव का वचन, अभिमन्यु का कर्म और महाभारत का धर्मयुद्ध – इन सभी कारणों से श्रीकृष्ण ने इस प्रसंग में हस्तक्षेप नहीं किया। उनका कर्तव्य केवल धर्म की स्थापना करना था, न कि किसी की नियति को बदलना।
अभिमन्यु का बलिदान केवल एक वीर योद्धा की शहादत नहीं थी, बल्कि यह धर्म की पुनर्स्थापना की प्रक्रिया का एक अनिवार्य अंग था। उसका पराक्रम और उसकी बलिदान गाथा आज भी लोगों को धर्म, साहस और कर्तव्यनिष्ठा का पाठ पढ़ाती है।
भावनात्मक संवाद: जब अर्जुन ने कृष्ण से प्रश्न किया
जब अर्जुन को यह ज्ञात हुआ कि उनका पुत्र अभिमन्यु वीरगति को प्राप्त हो गया, तो वे क्रोध और शोक से भर उठे। वे तुरंत श्रीकृष्ण के पास पहुँचे और दुःखभरे स्वर में बोले,
"माधव! आपने सब कुछ जानते हुए भी मेरे पुत्र को बचाया क्यों नहीं? आप तो स्वयं नारायण हैं, आप चाहते तो यह अन्याय रोक सकते थे!"
श्रीकृष्ण ने अर्जुन के कंधे पर हाथ रखा, उनकी आँखों में करुणा थी। वे बोले,
"पार्थ, मैंने केवल वही किया जो धर्म और प्रकृति के नियमों के अनुकूल था। अभिमन्यु का जन्म ही अल्पायु के लिए हुआ था। वह देवपुत्र था और उसे अपने लोक में लौटना ही था। किंतु क्या तुमने देखा, उसने कैसे अकेले ही एक दिन तक युद्ध कर इतने महारथियों को रोके रखा? उसने धर्म के मार्ग पर रहते हुए अपने कर्तव्य को पूरी निष्ठा से निभाया। उसका बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा, यह तुम्हें और सम्पूर्ण धर्मयोद्धाओं को प्रेरित करेगा।"
अर्जुन की आँखों में आँसू थे, परंतु उन्होंने श्रीकृष्ण के शब्दों में सच्चाई को महसूस किया। उनके हृदय में अपने पुत्र के लिए गर्व भी था।
निष्कर्ष
महाभारत केवल एक युद्ध नहीं, बल्कि जीवन का दर्शन है। श्रीकृष्ण ने स्वयं अर्जुन को गीता के माध्यम से यही सिखाया कि कर्म करो, फल की चिंता मत करो। अभिमन्यु ने अपने कर्म को पूरी निष्ठा और पराक्रम के साथ निभाया, और इसलिए वह इतिहास में अमर हो गया।
श्रीकृष्ण का अभिमन्यु को न बचाना यह दर्शाता है कि ईश्वर भी नियति के विधान में हस्तक्षेप नहीं करते। उन्होंने महाभारत के युद्ध को उसके स्वाभाविक प्रवाह में चलने दिया, ताकि धर्म की स्थापना हो सके और अधर्म का नाश हो।
अतः वीर अभिमन्यु केवल एक योद्धा नहीं, बल्कि एक आदर्श हैं – जो हमें यह सिखाते हैं कि धर्म और कर्तव्य के मार्ग पर चलते हुए, हमें अपने जीवन की हर चुनौती का सामना साहस और निष्ठा के साथ करना चाहिए।
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