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Showing posts from April, 2025

कर भला तो हो भला

 कर भला तो हो भला जटायु और भीष्म पितामह  प्रस्तावना भारतीय संस्कृति में धर्म और कर्म के सिद्धांतों का गहरा महत्व है। रामायण और महाभारत जैसे महान ग्रंथों में ऐसे अनेक चरित्र और घटनाएं हैं जो हमें इन सिद्धांतों की गहराई को समझने में मदद करती हैं। प्रस्तुत कथा जटायु और भीष्म पितामह के जीवन के दो महत्वपूर्ण प्रसंगों पर आधारित है, जो हमें यह सिखाते हैं कि शक्ति, ज्ञान और वरदान से भी अधिक महत्वपूर्ण है धर्म के प्रति हमारी निष्ठा और अन्याय के विरुद्ध हमारी आवाज। यह कहानी हमें 'कर भला तो हो भला' के शाश्वत सत्य को विभिन्न दृष्टिकोणों से समझने में मदद करती है। जटायु: एक साधारण पक्षी का असाधारण धर्म दृश्य 1: अपहरण और संकल्प आकाश में रावण का भयानक पुष्पक विमान उड़ रहा था। विमान में बैठी माता सीता भय और शोक से व्याकुल थीं। नीचे, दंडकारण्य के शांत वन में, एक वृद्ध गिद्ध अपनी कमजोर नजरों से आकाश की ओर देख रहा था। यह जटायु था, जो कभी सूर्य के सारथी अरुण का पुत्र और पक्षियों का महान राजा हुआ करता था, लेकिन अब वृद्धावस्था और शारीरिक दुर्बलता से घिरा था। जटायु (स्वगत): "यह कैसा दृश्य है? यह ...

आख़िरी भरोसा — ईश्वर का

आख़िरी भरोसा — ईश्वर का  एक भावनात्मक, संवादात्मक कथा जीवन एक रहस्यमयी यात्रा है… कभी धूप, कभी छाँव। ऐसे पल भी आते हैं जब हमारे चारों ओर अँधेरा छा जाता है। हर उम्मीद की किरण धुंधली पड़ जाती है, हर अपना पराया लगने लगता है। ऐसा लगता है मानो सारे रास्ते बंद हो गए हों… हर दरवाज़ा हमारी आहों को अनसुना कर रहा हो। उस गहन निराशा में, जब कोई सहारा नहीं सूझता… तब एक ही ज्योति टिमटिमाती है — ईश्वर की।  वह अविचल प्रकाश, जो हमें याद दिलाता है कि अंतहीन अंधकार के बाद भी एक उम्मीद बाकी है। आज की कहानी एक ऐसे ही मासूम की है… जिसके छोटे से कंधों पर दुनिया का बोझ डाल दिया गया था। जिसके पास अपनों का साया नहीं था… सिवाय उस सर्वशक्तिमान के, जिस पर उसका अटूट विश्वास था। (धीरे से पृष्ठभूमि बदलती है — राजमहल की भव्यता की झलक, पर उसमें उदासी का भाव) बहुत समय पहले, एक विशाल और समृद्ध राज्य हुआ करता था। वहाँ के महाराजा वीरेंद्र अपनी अपार संपत्ति और न्यायप्रिय शासन के लिए दूर-दूर तक जाने जाते थे। उनकी आज्ञा का पालन पत्थर की लकीर माना जाता था। प्रजा सुखी थी, राज्य में शांति थी… फिर भी, महाराजा का हृदय एक ...

राजा का प्रश्न और महात्मा का उत्तर

राजा का प्रश्न और महात्मा का उत्तर समर सिंह का राजदरबार , जहाँ कला और वैभव का अद्भुत संगम है। स भव्य राजदरबार, जहाँ कला और वैभव का अद्भुत संगम है। स्वर्ण और चाँदी की कारीगरी दीवारों पर चमक रही है, कीमती पत्थरों से जड़े सिंहासन की आभा देखते ही बनती है। दीवारों पर प्राचीन ग्रंथों के श्लोक और देवी-देवताओं के मनमोहक चित्र उकेरे गए हैं। सुगंधित धूप और फूलों की महक वातावरण को पवित्र बना रही है।  सिंहासन पर महाराजा विराजमान हैं, उनकी वेशभूषा शाही है, परन्तु उनके चेहरे पर एक गहरी उदासी और विचारमग्नता स्पष्ट झलक रही है। उनके चारों ओर कर्तव्यनिष्ठ दरबारी मंत्री, न्यायप्रिय प्रजापालक और उत्सुक साधारण नागरिक खड़े हैं, सभी राजा की मनोदशा से चिंतित हैं। राजा समर सिंह: (गहरी साँस खींचते हुए, उनका स्वर भावनाओं से ओतप्रोत है, जैसे किसी अनसुलझे रहस्य से जूझ रहे हों) “मेरे प्रिय मंत्रीगण, प्रजापालक और मेरे निष्ठावान नागरिकों… इस राजदरबार की चकाचौंध और वैभव के बीच भी, मेरे हृदय में एक अजीब सी रिक्तता अनुभव होती है। मैंने अपनी प्रजा के कल्याण के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया है। उनकी सुरक्षा के लिए शक्...

राहु का रहस्य — क्यों उसका केवल सिर ही जीवित है

राहु का रहस्य — क्यों उसका केवल सिर ही जीवित है बहुत पुरानी बात है… जब देवता और दानव दोनों मिलकर समुद्र मंथन कर रहे थे। इस महा प्रयत्न में मंथन से अमूल्य रत्न, दिव्य औषधियाँ और अनेक विचित्र वस्तुएँ तो निकलीं… पर सबकी नजरें केवल एक चीज़ पर टिकी थीं—अमृत। वो अमृत, जो किसी को भी अमर बना सकता था। अंततः जब अमृत कलश निकला, तो उसकी प्राप्ति के लिए देवताओं और दानवों में होड़ लग गई। दानव छल से अमृत कलश छीनकर भाग निकले। देवता घबरा गए—“अगर दानव अमर हो गए, तो अधर्म का साम्राज्य छा जाएगा!” सभी देवता भागते हुए भगवान विष्णु के पास पहुँचे। “प्रभु! अब क्या करें? दानव अमृत ले गए हैं!” भगवान विष्णु मुस्कुराए। “चिंता मत करो। अमृत पर केवल धर्म का अधिकार है। इसे देवताओं तक पहुँचाना मेरा उत्तरदायित्व है।” फिर क्या था? भगवान विष्णु ने एक अनुपम, मोहक रूप धारण किया—मोहिनी रूप। उस रूप की दिव्यता, सौंदर्य और आकर्षण ऐसा था कि बड़े से बड़ा तपस्वी भी उस मोहिनी माया में बंध जाए। मोहिनी रूप में भगवान दानवों की सभा में पहुँचे। दानव उस अनुपम सौंदर्य को देख ठगे से रह गए। मोहिनी ने मुस्कराकर कहा— “यद...

धन, पुत्र, वही जो परमार्थ में लगे

धन, पुत्र, वही जो परमार्थ में लगे  धर्म और समाज में यह प्रश्न सदैव विचारणीय रहा है कि “हमारा क्या है?” क्या वह संपत्ति, जो हम अर्जित करते हैं? क्या वे संतानें, जिन्हें हमने जन्म दिया है? या वह समय, जो हमने जीया? प्राचीन भारत की एक कथा इस प्रश्न को तीन सरल सवालों के माध्यम से अत्यंत गहराई से उजागर करती है। प्राचीन समय में एक नगर में एक धनी सेठ सुरज मल  रहते थे। समाज में उनका सम्मान इस कारण से अधिक था कि वे न केवल धनवान थे, अपितु संत-महात्माओं के प्रति सेवा-भाव में सदैव अग्रणी रहते थे। जब भी कोई साधु, संत, या महापुरुष नगर में पधारते, सेठ उन्हें अपने घर आमंत्रित करते, आदरपूर्वक सत्कार करते और भोजनादि की व्यवस्था करते। एक दिन एक तपस्वी महात्मा नगर में आए। नगरवासियों ने उन्हें बताया कि सेठ जी सदैव संत सेवा के इच्छुक रहते हैं। अतः महात्मा जी को सेठ के घर ले जाया गया। सेठ उस समय किसी व्यापारिक कार्य से बाजार गए हुए थे। घर पर केवल उनकी पत्नी, रमा , उपस्थित थीं। उन्होंने संत को विधिवत स्वागत किया, आसन ग्रहण कराया और भोजन परोसने लगीं। भोजन के दौरान महात्मा जी ने सहज जिज्ञास...