अहंकार का अंत
अहंकार का अंत
एक समय की बात है। एक युवा ऋषि अपनी वृद्ध माता और लाचार पिता को बिलखता छोड़कर तपस्या करने वन चले गए। उन्होंने कठोर तप किया, वर्ष बीते, और अंततः उनकी साधना पूरी हुई।
जिस दिन ऋषि ने तपस्या से आँखें खोलीं, उस दिन आकाश में एक कौवा उड़ रहा था। उसकी चोंच में एक नन्ही चिड़िया का बच्चा दबा हुआ था, जो जीवन के लिए संघर्ष कर रहा था।
ऋषि के मन में करुणा उमड़ी, परंतु तपस्या के गर्व ने उसे ढँक लिया। उन्होंने क्रोध से कौवे की ओर देखा। उनकी आँखों से अग्नि की ज्वाला फूटी और कौवा जलकर वहीं भस्म हो गया।
ऋषि ने जब अपने इस शक्ति-संपन्न स्वरूप को देखा तो उनके चेहरे पर गर्व की मुस्कान आ गई। उनके मन में अहंकार जाग उठा—“मैं अब केवल अपने दृष्टि-बल से किसी को भी नष्ट कर सकता हूँ।”
अहंकार से भरे हुए वे मठ की ओर चल पड़े। चलते-चलते उन्हें मार्ग में एक घर दिखाई दिया।
वे दरवाजे के सामने खड़े हुए और ऊँची आवाज में पुकारा—
“भिक्षां देहि!”
परंतु भीतर से कोई उत्तर नहीं आया। ऋषि ने फिर पुकारा, इस बार उनका स्वर कुछ कठोर था। लेकिन फिर भी कोई बाहर नहीं आया।
अब ऋषि क्रोधित हो गए। उन्होंने तीसरी बार ऊँची आवाज में कहा—
“अरे भीतर कौन है? क्या तुम जानती नहीं कि एक ऋषि द्वार पर खड़ा है? मेरी अवहेलना करने का परिणाम तुम जानती हो?”
इस बार भीतर से एक शांत किन्तु दृढ़ स्वर आया—
“स्वामी जी, कृपया थोड़ा धैर्य रखें। मैं अभी साधना में हूँ। जब मेरी साधना समाप्त हो जाएगी, तब मैं आपको भिक्षा दूँगी।”
यह सुनते ही ऋषि का चेहरा तमतमा उठा। वे क्रोध में काँपने लगे—
“दुष्टा! एक ऋषि को प्रतीक्षा करवा रही हो? क्या तुम नहीं जानती कि मेरे क्रोध की अग्नि से तुम्हारा अस्तित्व समाप्त हो सकता है?”
अंदर से वही शांत स्वर पुनः उभरा—
“महात्मन, मैं जानती हूँ कि आप मुझे शाप देना चाहेंगे, लेकिन मैं कोई कौवा नहीं, जो आपके क्रोध की अग्नि से जलकर भस्म हो जाऊँगी।”
ऋषि चौंक गए। यह स्त्री कौन थी? उसे यह कैसे ज्ञात हुआ कि उन्होंने कौवे को भस्म किया था?
कुछ देर बाद दरवाजा खुला, और एक साधारण गृहिणी उनके सामने खड़ी थी। उसने सिर झुकाकर हाथ जोड़ लिए।
ऋषि आश्चर्य में पड़ गए। उन्होंने गंभीर स्वर में पूछा—
“देवि, तुम कौन हो? और तुम्हें यह कैसे ज्ञात हुआ कि मैंने कौवे को भस्म किया?”
महिला मुस्कराई और विनम्रता से बोली—
“महात्मन, मैं कोई विशेष तपस्विनी नहीं हूँ। मैं तो बस अपने पति, बच्चों, माता-पिता और समाज के प्रति अपने कर्तव्यों का निष्ठापूर्वक पालन करती हूँ। यही मेरी साधना है, यही मेरी सिद्धि है।”
ऋषि का सिर शर्म से झुक गया। उन्होंने पहली बार अनुभव किया कि असली साधना जंगलों में नहीं, बल्कि अपने कर्तव्यों के पालन में है।
उनके भीतर वर्षों से संचित अहंकार चूर-चूर हो चुका था।
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