सत्संग की महिमा

 सत्संग की महिमा 

एक समृद्ध राज्य में, रात के अंधेरे में महल के खजाने से बहुमूल्य रत्न चोरी हो जाते हैं। सुबह होते ही राजा को इसका पता चलता है। वह क्रोध में भर उठते हैं।


राजा (क्रोधित स्वर में): “मेरे खजाने से रत्न चोरी हो गए? कौन है यह दुस्साहसी? सिपाहियों, उसे जल्द से जल्द पकड़ो और मेरे सामने पेश करो!”


राजा के आदेश पर सिपाही तुरंत चोर की खोज में निकल पड़ते हैं। उन्हें चोरी के स्थान पर पैरों के निशान मिलते हैं, जो नगर से बाहर एक गाँव की ओर जाते हैं। सिपाही उन पदचिह्नों का पीछा करते हुए गाँव पहुँच जाते हैं।

गाँव में एक वृक्ष के नीचे संतश्री का सत्संग चल रहा है। लोग श्रद्धा से बैठे सुन रहे हैं। संत गीता और रामायण के श्लोकों की व्याख्या कर रहे हैं। वहीं, भीड़ में एक व्यक्ति चुपचाप बैठा है—वह और कोई नहीं, बल्कि वही चोर रामू है!


संत: “जो भी सच्चे हृदय से भगवान की शरण में आता है, उसके सभी पाप प्रभु स्वयं क्षमा कर देते हैं। जो अपने पापों से सच्चा पश्चाताप कर लेता है और पुनः पाप न करने का संकल्प लेता है, वह नया जन्म पाता है।”


ये शब्द रामू के दिल में गहरे उतर जाते हैं। वह सोचने लगता है।


रामू (मन में, आँखों में पश्चाताप के आँसू): “मैं कब तक पाप करता रहूँगा? क्या मेरा जीवन यूँ ही बीत जाएगा? अगर भगवान सच में सब पाप क्षमा कर सकते हैं, तो मैं भी एक नया जीवन शुरू कर सकता हूँ!”


संत की वाणी ने उसके हृदय को झकझोर दिया। उसने वहीं निश्चय कर लिया—“अब मैं कभी चोरी नहीं करूँगा! मैं भगवान का हो गया!”*

 यह संकल्प लेते ही उसे एक असीम शांति का अनुभव हुआ। सत्संग समाप्त हुआ और लोग उठने लगे। रामू भी बाहर निकला, लेकिन सिपाही पहले से ही वहाँ खड़े थे।*



 चोर की गिरफ्तारी और राजा के सामने पेशी

सिपाहियों ने रामू को पहचान लिया और तुरंत पकड़ लिया।


सिपाही (कठोरता से): “आखिर पकड़ में आ ही गया! चलो, तुम्हें राजा के सामने ले चलते हैं।”


रामू बिना किसी विरोध के चुपचाप उनके साथ चला गया। वह जानता था कि उसने पहले अपराध किया था, लेकिन अब वह बदल चुका था।


राजा के दरबार में रामू को पेश किया गया।


राजा (गंभीर स्वर में): “क्या तुमने ही मेरे महल में चोरी की?”


रामू (शांत और दृढ़ स्वर में): “महाराज, मैंने चोरी की थी, लेकिन अब मैं वह इंसान नहीं हूँ। सत्संग ने मुझे बदल दिया। मैंने भगवान की शरण ले ली है।”


(राजा और दरबार के सभी लोग यह सुनकर अचंभित रह गए। सिपाही नाराज होकर बोले।)


सिपाही: “महाराज, यह झूठ बोल रहा है! हम इसके पदचिह्नों को पहचानते हैं। यह चोर ही है!”


राजा को संदेह हुआ, उन्होंने रामू की परीक्षा लेने का आदेश दिया।



 परीक्षा और चमत्कार

रामू की परीक्षा लेने के लिए उसके हाथ पर पीपल के ढाई पत्ते रखकर उसे कच्चे सूत से बाँधा गया। फिर उस पर तपता हुआ लोहे का टुकड़ा रखा गया।


आश्चर्य! रामू का हाथ जला नहीं। न तो सूत जला, न ही पत्ते। लेकिन जैसे ही लोहे को नीचे रखा गया, धरती काली पड़ गई! राजा और दरबार के लोग हतप्रभ रह गए।


राजा (आश्चर्य से): “यह कैसे संभव है? अगर तुमने चोरी की थी, तो तुम्हारा हाथ क्यों नहीं जला?”


रामू (श्रद्धा से): “महाराज, मैंने सत्संग में सुना कि जब कोई व्यक्ति सच्चे हृदय से भगवान की शरण लेता है और पाप छोड़ने का दृढ़ निश्चय करता है, तो वह नया जन्म पाता है। सत्संग सुनने के बाद मैंने भी अपने पाप छोड़ने का संकल्प लिया। जब मैंने चोरी की थी, तब मैं पापी था। लेकिन अब मैं बदल चुका हूँ। वह पापी रामू अब नहीं रहा—इसलिए मेरा हाथ नहीं जला।”


राजा की आँखों में श्रद्धा और विस्मय का भाव उमड़ आया। उन्होंने रामू को गले लगा लिया।



 राजा की दया और रामू का नया जीवन



राजा (भावुक होकर): “सत्संग की शक्ति अद्भुत है! इसने एक पापी को संत बना दिया। मैं नतमस्तक हूँ।”


रामू (कृतज्ञता से, आँखों में आँसू): “धन्यवाद, महाराज! भगवान की कृपा से मुझे नया जीवन मिला है। अब मैं ईमानदारी से जीवन व्यतीत करूँगा और दूसरों को भी सही राह दिखाऊँगा।”


राजा ने रामू को क्षमा कर दिया और उसे एक सम्मानजनक जीवन जीने का अवसर दिया।




कहानी से शिक्षा (Moral of the Story)



  1. सत्संग का प्रभाव चमत्कारी होता है – एक सच्ची आध्यात्मिक शिक्षा जीवन को बदल सकती है, चाहे वह कितना भी भटका हुआ क्यों न हो।
  2. सच्चे पश्चाताप से नया जीवन संभव है – यदि कोई व्यक्ति सच्चे हृदय से अपनी गलतियों को स्वीकार करे और सुधार का दृढ़ संकल्प ले, तो वह भगवान के अनुग्रह से नया जन्म पा सकता है।
  3. कुसंग पतन की ओर ले जाता है, सत्संग उत्थान की ओर – यदि व्यक्ति सत्संग नहीं करेगा, तो वह कुसंग का शिकार हो सकता है, जो उसे पतन की ओर धकेल देगा।
  4. भगवान की शरण में सच्ची मुक्ति है – जिसने भगवान को अपना लिया, उसके लिए भूतकाल के पाप कोई मायने नहीं रखते।



“सत्संग वह अमृत है जो पतित को पावन बना सकता है। इसे कभी व्यर्थ मत जाने दो!”


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