राजा का प्रश्न और महात्मा का उत्तर
राजा का प्रश्न और महात्मा का उत्तर
समर सिंह का राजदरबार , जहाँ कला और वैभव का अद्भुत संगम है। स भव्य राजदरबार, जहाँ कला और वैभव का अद्भुत संगम है। स्वर्ण और चाँदी की कारीगरी दीवारों पर चमक रही है, कीमती पत्थरों से जड़े सिंहासन की आभा देखते ही बनती है। दीवारों पर प्राचीन ग्रंथों के श्लोक और देवी-देवताओं के मनमोहक चित्र उकेरे गए हैं। सुगंधित धूप और फूलों की महक वातावरण को पवित्र बना रही है।
सिंहासन पर महाराजा विराजमान हैं, उनकी वेशभूषा शाही है, परन्तु उनके चेहरे पर एक गहरी उदासी और विचारमग्नता स्पष्ट झलक रही है। उनके चारों ओर कर्तव्यनिष्ठ दरबारी मंत्री, न्यायप्रिय प्रजापालक और उत्सुक साधारण नागरिक खड़े हैं, सभी राजा की मनोदशा से चिंतित हैं।
राजा समर सिंह: (गहरी साँस खींचते हुए, उनका स्वर भावनाओं से ओतप्रोत है, जैसे किसी अनसुलझे रहस्य से जूझ रहे हों)
“मेरे प्रिय मंत्रीगण, प्रजापालक और मेरे निष्ठावान नागरिकों… इस राजदरबार की चकाचौंध और वैभव के बीच भी, मेरे हृदय में एक अजीब सी रिक्तता अनुभव होती है। मैंने अपनी प्रजा के कल्याण के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया है। उनकी सुरक्षा के लिए शक्तिशाली सेना का गठन किया, अन्न की कमी न हो इसलिए उपजाऊ भूमि का विस्तार किया, बेरोजगारों को उनके कौशल के अनुसार रोजगार दिया, गरीब कन्याओं के विवाह में सहायता की, उनके बच्चों की शिक्षा और नैतिक मूल्यों के विकास के लिए गुरुकुल स्थापित किए—मैंने हर संभव प्रयास किया कि मेरी प्रजा सुखी और समृद्ध रहे। क्या कोई ऐसा कर्तव्य है जो मैंने उनके लिए पूर्ण निष्ठा से नहीं निभाया?”
**(राजा कुछ क्षण मौन हो जाते हैं, उनकी दृष्टि दूर कहीं खोई हुई है, मानो वे स्वयं अपने अंतर्मन में किसी जटिल प्रश्न का उत्तर ढूंढ रहे हों।) **
राजा : (उनकी आवाज़ में अब पीड़ा और एक अनसुलझा प्रश्न गूंज रहा है)
“तो फिर… जब मैं स्वयं उन्हें इतना सब कुछ अर्पित करता हूँ, तो वे भगवान की इतनी आराधना क्यों करते हैं? मेरी पूजा, मेरा सम्मान उस प्रकार क्यों नहीं करते जैसा वे उस अदृश्य शक्ति का करते हैं? क्या वह कोई ऐसी अलौकिक शक्ति है, जिसे मेरी बुद्धि समझ नहीं पा रही? क्या कोई ऐसा विशेष कार्य है, जो केवल वही दिव्य शक्ति कर सकती है, और मैं, एक राजा, समर्थ होकर भी नहीं कर सकता?”
**(राजा की आँखों में एक गहरी निराशा उतर आती है, उनके मन में अनगिनत प्रश्न उमड़ रहे हैं, जिनका उत्तर उन्हें कहीं नहीं मिल रहा। दरबार में सन्नाटा छा जाता है, सभी राजा की भावनाओं को महसूस कर रहे हैं, परन्तु किसी के पास कोई संतोषजनक उत्तर नहीं है।) **
वरिष्ठ मंत्री सोमनाथ: (धीरे से, उनके स्वर में गहरा सम्मान और थोड़ी हिचकिचाहट है)
“महाराज, आपका प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण और गूढ़ है। हमें ऐसा प्रतीत होता है कि इसका सटीक उत्तर केवल एक महान संत, एक सिद्ध महात्मा ही दे सकते हैं, जिनका दिव्य ज्ञान असीम हो और जिनका सीधा साक्षात्कार उस परम शक्ति से होता हो। वे ही हमें बता सकते हैं कि ईश्वर की लीला क्या है और वह किस प्रकार मानवीय सामर्थ्य से परे है।”
द्वितीय मंत्री राघव: (अपनी सहमति व्यक्त करते हुए)
“जी महाराज, मंत्री सोमनाथ उचित कह रहे हैं। हम साधारण मनुष्य उस परम शक्ति के कार्यों की गहराई को नहीं समझ सकते। केवल एक आत्मज्ञानी महात्मा ही आपको यह ज्ञान प्रदान कर सकते हैं कि भगवान का वह कौन सा विशेष कार्य है, जो केवल वही कर सकते हैं और हम नहीं।”
राजा समर सिंह: (कुछ क्षण विचार करते हैं, फिर एक दृढ़ निश्चय के साथ)
“ठीक है! यदि ऐसा है, तो विलंब कैसा? मेरे विश्वस्त सैनिक और मंत्रीगण, तुम सब तत्काल प्रभाव से राज्य के कोने-कोने में खोज करो! ऐसे किसी तेजस्वी महात्मा को ढूंढकर लाओ, जो मेरे इस जटिल प्रश्न का रहस्योद्घाटन कर सके। मुझे यह जानना ही होगा कि वह कौन सा अद्वितीय कार्य है, जो केवल भगवान ही कर सकते हैं, और हम, अपनी सारी शक्ति और प्रयासों के बावजूद, नहीं कर सकते।”
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**(दृश्य परिवर्तन: राजसी वैभव से दूर, प्रकृति की गोद में स्थित एक शांत और पवित्र कुटिया। चारों ओर घने वृक्षों की हरियाली है, पक्षियों का मधुर कलरव वातावरण में शांति घोल रहा है। कुटिया के भीतर एक दिव्य आभा व्याप्त है, जो बाहरी दुनिया की भागदौड़ से परे एक सूक्ष्म और शक्तिशाली ऊर्जा का अनुभव कराती है। मंत्रियों का एक दल, थका-हारा परन्तु आशा से भरा, उस कुटिया के द्वार पर पहुँचता है। भीतर, एक तेजस्वी महात्मा ध्यान में लीन हैं, उनका चेहरा अद्भुत शांति, गहन अनुभव और अलौकिक तेज से परिपूर्ण है।) **
वरिष्ठ मंत्री सोमनाथ: (कुटिया के द्वार पर विनम्रता से खड़े होकर, हाथ जोड़कर)
“हे महान संत, हम महाराजा वीरेंद्र सिंह के दूत हैं। वे एक गहरे प्रश्न से व्यथित हैं, जिसने हमारे हृदयों को भी आंदोलित कर दिया है। कृपया हमें मार्गदर्शन प्रदान करें।”
महात्मा: (धीरे-धीरे अपनी आँखें खोलते हैं, उनकी दृष्टि में करुणा और ज्ञान का सागर लहराता है)
“कहो, राजन का क्या प्रश्न है? यदि मेरे पास उसका उत्तर होगा, तो मैं अवश्य ही उसे प्रदान करूँगा।”
द्वितीय मंत्री राघव: (कुछ संकोच के साथ, परन्तु उनके स्वर में जिज्ञासा और आशा का मिश्रण है)
“महाराज जानना चाहते हैं कि जब वे अपनी प्रजा के लिए अपना सर्वस्व समर्पित करते हैं, तो फिर लोग भगवान की इतनी भक्ति क्यों करते हैं? क्या कोई ऐसा अद्वितीय कार्य है, जो केवल भगवान ही कर सकते हैं और मनुष्य की सामर्थ्य से परे है?”
महात्मा: (एक शांत मुस्कान उनके चेहरे पर फैल जाती है, मानो वे पहले से ही इस प्रश्न का सार जानते हों)
“यह प्रश्न सरल प्रतीत होता है, परन्तु इसके गूढ़ अर्थ को समझाने के लिए एक उचित समय और स्थान की आवश्यकता होगी। तुम लौट जाओ। मैं कल स्वयं तुम्हारे साथ राजदरबार में आकर महाराज के इस जिज्ञासा का समाधान करूँगा।”
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**(दृश्य परिवर्तन: अगले दिन, राजदरबार पहले से कहीं अधिक भव्य और शांत है। महाराजा वीरेंद्र सिंह और उनके सभी दरबारी उत्सुकता से महात्मा के आगमन की प्रतीक्षा कर रहे हैं। वातावरण में एक अजीब सी प्रत्याशा है। तभी, महात्मा शांत और तेजस्वी कदमों से दरबार में प्रवेश करते हैं। उनके चेहरे पर दिव्य शांति और आत्मविश्वास का अद्भुत तेज है। उनके आगमन से ही दरबार में एक पवित्र और शक्तिशाली ऊर्जा का संचार होता है। सभी दरबारी और नागरिक श्रद्धा और सम्मान से भर उठते हैं। महात्मा दरबार की मर्यादा का पालन करते हुए, महाराजा वीरेंद्र सिंह के चरणों में तीन बार झुककर प्रणाम करते हैं।) **
राजा समर सिंह: (गहरी श्रद्धा और सम्मान के साथ, सिंहासन से उठकर उनका स्वागत करते हुए)
“हे महात्मा, आपका स्वागत है। मैंने सुना है कि आपने मेरे हृदय के गहरे प्रश्न को समझा है, और मुझे पूर्ण विश्वास है कि आपके पास उसका सही उत्तर होगा। कृपया, मुझे उस ज्ञान से अवगत कराएं।”
महात्मा: (शांत, मधुर परन्तु दृढ़ स्वर में)
“राजन, तुम्हारा प्रश्न वास्तव में अत्यंत महत्वपूर्ण और विचारणीय है। परन्तु, सत्य जानने से पहले, मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि तुम्हें प्रश्न पूछने की उचित कला सीखनी होगी।”
राजा : (आश्चर्यचकित होते हुए, उनके चेहरे पर जिज्ञासा और थोड़ा सा भ्रम है)
“क्या मतलब है आपका, महात्मा जी? क्या मैं अनजाने में कोई भूल कर रहा हूँ?”
महात्मा: (गहरी समझ और करुणा से भरी दृष्टि से राजा को देखते हुए)
“राजन, जिस स्थान पर ज्ञान प्राप्त किया जाता है, वहाँ ज्ञान के जिज्ञासु को सदैव विनम्रतापूर्वक नीचे बैठना चाहिए। और जो ज्ञान प्रदान करता है, उसे सदैव उच्च स्थान पर प्रतिष्ठित किया जाता है। अब देखो, तुम स्वयं इस भव्य सिंहासन पर विराजमान हो, और मैं, ज्ञान का एक तुच्छ साधक, नीचे खड़ा हूँ। क्या यह ज्ञान प्राप्त करने की उचित विधि है?”
**(राजा कुछ क्षण गहन चिंतन में डूब जाते हैं, महात्मा के शब्दों की गहराई को समझने का प्रयास करते हैं। फिर, वे धीरे-धीरे अपने सिंहासन से उठते हैं और अत्यंत विनम्रता से महात्मा को वह आसन अर्पित करते हैं। महात्मा शांत भाव से उस पर विराजमान होते हैं।) **
राजा समर सिंह: (हाथ जोड़कर, उनके स्वर में अब अहंकार का लेशमात्र भी नहीं है, केवल शांति और ज्ञान की तीव्र इच्छा है)
“अब बताइए, हे गुरुदेव।”
महात्मा: (सिंहासन पर स्थिर भाव से बैठते हुए, राजा के सिर पर सजे हुए बहुमूल्य रत्न जड़ित मुकुट की ओर इंगित करते हुए)
“राजन, अब इस अहंकार के प्रतीक, इस मुकुट को भी उतार दो। जब तक तुम्हारे मस्तिष्क पर यह भार रहेगा, जब तक तुम स्वयं को सबसे उच्च मानोगे, तब तक दिव्य ज्ञान तुम्हारे अंतःकरण में प्रवेश नहीं कर सकता। एक खाली, निष्कलंक हृदय ही उस परम सत्य को धारण करने योग्य होता है।”
**(राजा बिना किसी हिचकिचाहट के अपने सिर से मुकुट उतारते हैं और उसे महात्मा के चरणों में रख देते हैं। उनके चेहरे पर अब आत्म-साक्षात्कार की एक शांत चमक है।) **
राजा : (पूरी विनम्रता से सिर झुकाकर, उनके स्वर में अब केवल ज्ञान की पिपासा है)
“अब तो कृपा कर मुझे उस रहस्य से अवगत कराएं, हे महात्मा।”
महात्मा: (अपनी गहरी, ज्ञानपूर्ण दृष्टि राजा पर स्थिर करते हुए, उनके शब्दों में अनंत ज्ञान और आशीर्वाद का प्रवाह है)
“राजन, स्मरण करो, केवल कुछ क्षण पहले, तुम इस भव्य सिंहासन पर विराजमान थे, यह कीमती मुकुट तुम्हारे सिर की शोभा बढ़ा रहा था, और मैं, एक अनजान साधु, तुम्हारे सामने खड़ा होकर तुम्हें प्रणाम कर रहा था।”
**(राजा की आँखों में विस्मय और आत्म-निरीक्षण का भाव उमड़ता है, जैसे वह उस क्षण की वास्तविकता को पुनः अनुभव कर रहे हों।) **
महात्मा: (धीरे-धीरे, जैसे कोई शाश्वत सत्य प्रकट कर रहे हों)
“और अब देखो, केवल कुछ क्षणों के परिवर्तन से, मैं इस सिंहासन पर बैठा हूँ, वही मुकुट अब मेरे चरणों के पास है, और तुम, एक शक्तिशाली राजा, नीचे खड़े होकर मुझे प्रणाम कर रहे हो।”
**(राजा धीरे-धीरे उस गहन सत्य को समझने लगते हैं। उनके अंतर्मन में एक गहरी शांति का अनुभव होता है, जैसे किसी अदृश्य शक्ति ने उन्हें वास्तविकता का दर्पण दिखा दिया हो।) **
महात्मा:
“राजन, यही भगवान का अद्वितीय कार्य है। वे पल भर में राजा को रंक और रंक को राजा बना सकते हैं। यह परिवर्तन की शक्ति, यह भाग्य के पलटने की क्षमता केवल उस परम शक्ति के पास है। यह वही कार्य है, जो हम मानव, अपनी सारी शक्ति और प्रयासों के बावजूद, कभी भी पूर्ण रूप से नहीं कर सकते।”
**(राजा की आँखों में एक नया प्रकाश चमक उठता है। उनके हृदय पर ज्ञान का गहरा प्रभाव पड़ता है, और अब वे उस परम शक्ति की महिमा और अपनी सीमाओं को स्पष्ट रूप से समझ चुके हैं। उनके चेहरे पर अब अहंकार का लेशमात्र भी नहीं है, केवल गहरी संतुष्टि और शांति का भाव है।) **
**(दृश्य धीरे-धीरे धुंधला होता जाता है, महात्मा के ज्ञानपूर्ण शब्दों की गूंज पूरे दरबार में व्याप्त हो जाती है, और सभी के हृदय में एक गहरी समझ और उस परम शक्ति के प्रति भक्ति का भाव जागृत होता है।) **
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नैतिक शिक्षा:
ईश्वर के कार्य हमारी सीमित बुद्धि और समझ से परे होते हैं। हम अपने जीवन में कितना भी प्रयास कर लें, चाहे वह हमारी शक्ति, हमारी मेहनत या हमारी बुद्धिमत्ता का परिणाम हो, उस परम शक्ति के सामने वह सब कुछ क्षणिक और सीमित है। भगवान का कार्य न केवल समय और स्थान की सीमाओं से परे होता है, बल्कि वह हमें यह महत्वपूर्ण शिक्षा देता है कि हम इस संसार में केवल एक साधारण माध्यम हैं, और वही परम शक्ति सभी शक्तियों का वास्तविक स्रोत है। जब हम अपने अहंकार को त्याग देते हैं और पूरी श्रद्धा, विनम्रता और भक्ति के साथ उनकी शरण में जाते हैं, तभी हम सच्चे ज्ञान और शांति की ओर अग्रसर होते हैं।
अंतिम संदेश:
“जो स्वयं को सर्वशक्तिमान समझ बैठता है, वह केवल एक भ्रम में जीता है। इस संसार का असली सूत्रधार तो वह परम शक्ति है, जो पल भर में दृश्यों को बदलने की अद्भुत कला )
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