आख़िरी भरोसा — ईश्वर का


आख़िरी भरोसा — ईश्वर का 

एक भावनात्मक, संवादात्मक कथा

जीवन एक रहस्यमयी यात्रा है… कभी धूप, कभी छाँव। ऐसे पल भी आते हैं जब हमारे चारों ओर अँधेरा छा जाता है। हर उम्मीद की किरण धुंधली पड़ जाती है, हर अपना पराया लगने लगता है। ऐसा लगता है मानो सारे रास्ते बंद हो गए हों… हर दरवाज़ा हमारी आहों को अनसुना कर रहा हो। उस गहन निराशा में, जब कोई सहारा नहीं सूझता… तब एक ही ज्योति टिमटिमाती है — ईश्वर की। 

वह अविचल प्रकाश, जो हमें याद दिलाता है कि अंतहीन अंधकार के बाद भी एक उम्मीद बाकी है।

आज की कहानी एक ऐसे ही मासूम की है… जिसके छोटे से कंधों पर दुनिया का बोझ डाल दिया गया था। जिसके पास अपनों का साया नहीं था… सिवाय उस सर्वशक्तिमान के, जिस पर उसका अटूट विश्वास था।

(धीरे से पृष्ठभूमि बदलती है — राजमहल की भव्यता की झलक, पर उसमें उदासी का भाव)

बहुत समय पहले, एक विशाल और समृद्ध राज्य हुआ करता था। वहाँ के महाराजा वीरेंद्र अपनी अपार संपत्ति और न्यायप्रिय शासन के लिए दूर-दूर तक जाने जाते थे। उनकी आज्ञा का पालन पत्थर की लकीर माना जाता था। प्रजा सुखी थी, राज्य में शांति थी… फिर भी, महाराजा का हृदय एक गहरी उदासी से घिरा रहता था।

राजा (अपने विशाल कक्ष में अकेले, खिड़की से दूर क्षितिज को ताकते हुए):

“यह कैसा वैभव है… यह कैसी शक्ति है जो मुझे भीतर से खोखला महसूस कराती है? मेरे पास अनगिनत सैनिक हैं जो मेरी रक्षा के लिए जान दे सकते हैं, एक भव्य महल है जिसकी दीवारें इतिहास की गवाह हैं, अथाह धन है जो सात पीढ़ियों तक समाप्त नहीं होगा, और वह सम्मान है जिसके लिए बड़े-बड़े राजा तरसते हैं… फिर भी, कुछ अधूरा है। एक खालीपन है जो हर सफलता को फीका कर देता है।

हे प्रभु! मेरी झोली सूनी क्यों है? क्यों मेरी आँखों को वह सुख नसीब नहीं जो एक पिता अपनी संतान में देखता है? कौन संभालेगा मेरी विरासत? कौन इस राज्य को आगे बढ़ाएगा? मेरी मृत्यु के बाद इस सबका क्या अर्थ रह जाएगा?”

वर्ष बीतते गए। महाराजा ने हर संभव प्रयास किया। उन्होंने प्रसिद्ध मंदिरों में जाकर माथा टेका, कठिन व्रत रखे, गरीबों को दिल खोलकर दान दिया… उन्होंने वैद्य और हकीमों से सलाह ली, हर जड़ी-बूटी और उपचार आजमाया… लेकिन नियति अटल रही। उनकी गोद सूनी ही रही।

अंततः, थककर और निराशा के अथाह सागर में डूबकर… महाराजा ने अपने सबसे विश्वस्त दरबारियों, पुरोहितों और मंत्रियों को परामर्श के लिए बुलाया। उनके चेहरे पर वह दर्द स्पष्ट झलक रहा था जिसे वह वर्षों से छिपाते आ रहे थे।

पुरोहित (गहरी चिंता के साथ):

“महाराज, हमने शास्त्रों और वेदों के अनुसार सभी ज्ञात उपाय कर लिए हैं। यदि आपकी संतान प्राप्ति की इच्छा इतनी प्रबल है और सभी लौकिक प्रयास विफल हो चुके हैं… तो अब केवल एक गुप्त और अत्यंत दुर्लभ तांत्रिक अनुष्ठान ही कोई मार्ग दिखा सकता है। परन्तु… राजन, इस मार्ग की एक भारी कीमत है, एक कठोर शर्त है।”

राजा (उत्सुकता और आशंका से):

“कैसी शर्त है, गुरुदेव? यदि मेरी वंशबेल को आगे बढ़ाने का कोई भी उपाय है, तो मैं हर कीमत चुकाने को तैयार हूँ।”

तांत्रिक (एक रहस्यमय और भयावह स्वर में):

“महाराज, इस अनुष्ठान की सिद्धि के लिए एक निरपराध, निर्दोष बालक की बलि देनी होगी। उस पवित्र आत्मा के बलिदान से देवता प्रसन्न होंगे, और आपके लिए एक तेजस्वी पुत्र रत्न की प्राप्ति निश्चित हो जाएगी।”

राजा का सिर शर्म और दुख से झुक गया। उनके चेहरे पर पीड़ा की गहरी रेखाएँ उभर आईं। उनके हृदय में एक भीषण द्वंद्व छिड़ गया — एक ओर उनकी अटूट इच्छा थी अपने वंश को चलाने की, अपनी विरासत को सौंपने की, और दूसरी ओर धर्म और न्याय के सिद्धांत थे, एक निर्दोष जीवन लेने का विचार था। यह एक ऐसी लड़ाई थी जिसमें उनकी आत्मा कराह रही थी।

परन्तु, वर्षों की निराशा और पुत्र की तीव्र अभिलाषा ने अंततः उनके विवेक पर विजय प्राप्त कर ली। उन्होंने अपने मन को कठोर कर लिया और एक भयानक आदेश जारी किया। पूरे राज्य में ढिंढोरा पिटवाया गया, एक ऐसा ऐलान जिसने हर माँ-बाप के कलेजे को कंपा दिया।

सैनिक (मुख्य सड़कों और गलियों में ऊँची आवाज़ में ऐलान करते हुए):

“सुनो! सुनो! सुनो! महाराजा वीरेंद्र की आज्ञा है! जो कोई भी अपना बच्चा राजा को देगा… उसे इतना स्वर्ण और रत्न दिया जाएगा कि उसकी सात पीढ़ियाँ भी गरीबी का मुँह नहीं देखेंगी। यह एक सुनहरा अवसर है अपने परिवार को हमेशा के लिए समृद्ध बनाने का!”

(पृष्ठभूमि बदलती है — एक गरीब बस्ती का दृश्य, जहाँ मिट्टी की दीवारों वाली टूटी-फूटी झोपड़ियाँ हैं… उदासी और अभाव का माहौल)

एक झोपड़ी के कोने में एक निर्धन परिवार बैठा है। माँ फटे हुए कपड़ों को सील रही है, उसके चेहरे पर चिंता की गहरी छाया है। पिता एक टूटी हुई खाट पर लेटा है, उसका शरीर बीमारी से कमजोर हो चुका है। चार-पाँच छोटे बच्चे धूल-मिट्टी में खेल रहे हैं, उनकी हँसी में भी अभाव की कसक महसूस होती है।

सबसे अलग, एक कोने में एक बच्चा बैठा है। वह लगभग सात या आठ वर्ष का होगा। उसकी आँखें शांत और गंभीर हैं, उनमें एक अजीब सी गहराई है जो उसकी उम्र से कहीं ज़्यादा परिपक्व लगती है। उसकी गोद में एक पुरानी, फटी हुई संत की किताब है, और उसके होंठों पर धीरे-धीरे कोई मधुर भजन गुनगुना रहा है। यह बच्चा, जिसका नाम माधव था, अपनी दुनिया में खोया रहता था, जहाँ उसे किताबों और प्रार्थनाओं में शांति मिलती थी।

पिता (अपनी पत्नी की ओर निराशा भरी नज़रों से देखते हुए, कमजोर आवाज़ में):

“सुनी तुमने? राजा का ऐलान… अगर हम माधव को उन्हें दे दें तो क्या होगा? यह तो वैसे भी सारा दिन भगवान के नाम पर बैठा रहता है। घर के किसी काम का नहीं… और हम सब… हम सब भूखे मर रहे हैं।”

माँ (अपने काम को रोककर, डर और विरोध के भाव से):

“यह तुम क्या कह रहे हो? वह हमारा बेटा है! हमारी जान है वह!”

पिता (निर्दयता से):

“हाँ… बेटा है… पर क्या करें? भूख से तड़पते हुए बाकी बच्चों को देखने से अच्छा है कि एक को देकर बाकी की जान बचा लें। राजा खुश हो जाएगा, और शायद हमारे सारे दुख हमेशा के लिए मिट जाएँ।”

और फिर… बिना माधव से पूछे, बिना उसकी भावनाओं को समझे… सिर्फ़ अपनी स्वार्थ भरी उम्मीदों के लिए, उस मासूम बच्चे को राजा के महल ले जाया गया। माधव ने कोई विरोध नहीं किया। उसने अपनी फटी हुई किताब को सीने से लगाया और चुपचाप उन सैनिकों के साथ चल दिया, उसकी आँखों में न आँसू थे, न डर… सिर्फ़ एक गहरी शांति थी।

(राजमहल का दृश्य — यज्ञशाला में भयावह तैयारी चल रही है। काले वस्त्र पहने तांत्रिक मंत्रोच्चारण कर रहे हैं, ढोल और शंख की भयानक ध्वनि वातावरण में गूँज रही है। एक बलि वेदी सजी हुई है, और हवा में धूप और अजीबोगरीब जड़ी-बूटियों की गंध फैली हुई है।)

तांत्रिक (अपनी भयावह आवाज़ में):

“सभी तैयारियाँ पूर्ण हैं। बलि का मुहूर्त निकट आ रहा है। महाराज को सूचित किया जाए।”

महाराजा वीरेंद्र धीरे-धीरे यज्ञशाला में प्रवेश करते हैं। उनका चेहरा पीला पड़ चुका है, उनकी आँखों में एक अजीब सी बेचैनी और दुख का भाव है। वह अपने कर्मों के बोझ से दबे हुए लग रहे हैं।

तांत्रिक:

“हे बालक, बलि से पूर्व यदि तुम्हारी कोई अंतिम इच्छा है, तो हमें बताओ।”

सभी की नज़रें उस छोटे से बच्चे पर टिकी हुई हैं। माधव शांत खड़ा है, उसके चेहरे पर अद्भुत धैर्य और शांति का भाव है।

माधव (धीरे से, पर उसकी आवाज़ में दृढ़ता है):

“हाँ… मेरी एक छोटी सी इच्छा है। क्या आप कृपया थोड़ी सी रेत मँगवा सकते हैं?”

सभी हैरान रह जाते हैं। इस भयावह माहौल में, मृत्यु के इतने करीब खड़ा एक बच्चा रेत माँग रहा है? सैनिकों के इशारे पर रेत लाई जाती है।

माधव ज़मीन पर बैठ जाता है और धीरे-धीरे, ध्यान से रेत के चार छोटे ढेर बनाता है। फिर वह एक-एक करके पहले तीन ढेरों को अपने छोटे हाथों से मिटा देता है। और फिर… आखिरी ढेरी के सामने हाथ जोड़कर बैठ जाता है, उसकी आँखें बंद हैं जैसे वह किसी गहरी प्रार्थना में लीन हो।

राजा (उत्सुकता और कुछ हद तक झुंझलाहट से):

“बच्चे… यह तुमने क्या किया? रेत से यह कैसा खेल है? इस रहस्यमय कार्य का क्या अर्थ है?”

माधव (अपनी आँखें खोलकर, एक शांत और गंभीर स्वर में):

“यह कोई खेल नहीं है, राजन… यह मेरी आस्था का अंतिम चित्र है। यह उन रिश्तों और उन दायित्वों का प्रतीक है जिन पर मैंने भरोसा किया था।

पहली ढेरी — मेरे माता-पिता की थी। जिनका धर्म था कि वे मेरी रक्षा करें, मुझे प्यार दें, मेरा सहारा बनें। परन्तु उन्होंने मुझे अपने स्वार्थ के लिए बेच दिया… इसलिए मैंने यह ढेरी मिटा दी। मेरा भरोसा टूट गया।

दूसरी ढेरी — मेरे रिश्तेदारों और समाज के उन लोगों की थी जो चुप रहे, जिन्होंने अन्याय देखा पर आवाज़ नहीं उठाई, जब मुझे बचाया जा सकता था उन्होंने आँखें फेर लीं। इसलिए वह ढेरी भी मिट गई। मेरा विश्वास उठ गया।

तीसरी ढेरी — आपकी थी, महाराज। एक राजा का धर्म होता है अपनी प्रजा की रक्षा करना, न्याय करना, कमजोरों का सहारा बनना। पर आप ही मेरी बलि देने को प्रस्तुत हैं… अपनी स्वार्थ भरी इच्छा के लिए एक निर्दोष का जीवन लेने जा रहे हैं… तो इस ढेरी का भी कोई अस्तित्व नहीं रहा। मेरा आखिरी आसरा भी टूट गया।

अब बची है — बस यह एक ढेरी… जिसके सामने मैं हाथ जोड़कर बैठा हूँ। यह मेरे ईश्वर की है। मेरा आख़िरी भरोसा। मुझे अब किसी और पर भरोसा नहीं… बस उसी पर है… जो कभी नहीं छोड़ता। जो हर अन्याय देखता है और अंततः न्याय करता है।”

(यज्ञशाला में पूर्ण सन्नाटा छा जाता है। केवल धीमी और उदास रुद्रवीणा की ध्वनि सुनाई दे रही है, जो वातावरण की गंभीरता को और बढ़ा रही है।)

महाराजा वीरेंद्र अवाक रह गए। उस छोटे से बच्चे के शब्दों ने उनके हृदय को गहराई से छू लिया था। उनके भीतर कुछ पिघल रहा था — वर्षों से जमी हुई स्वार्थ और अंधविश्वास की बर्फ पिघल रही थी। एक बच्चा — जो मृत्यु के इतने करीब होकर भी नहीं डगमगाया। जिसकी आस्था इतनी दृढ़ थी कि उसकी छोटी सी आँखों में भी भय का कोई निशान नहीं था।

राजा (धीरे से, जैसे स्वयं से बातें कर रहे हों):

“एक बच्चा… जिसने अपनों को खो दिया, जिसने दुनिया की क्रूरता देखी… लेकिन फिर भी उसने भगवान पर अपना विश्वास नहीं खोया…

कितनी विडंबना है… मैं पुत्र पाने के लिए उसकी बलि देने चला था, और यह बालक स्वयं ही मेरे लिए एक सबक, एक प्रेरणा, एक संतान बन गया…”

(महाराजा वीरेंद्र उठते हैं, उनका चेहरा अब शांत और दृढ़ है। वह उपस्थित सभी लोगों की ओर देखते हैं और एक महत्वपूर्ण घोषणा करते हैं।)

राजा:

“आज से… यह बालक मेरा पुत्र है! यह माधव अब मेरा उत्तराधिकारी बनेगा। यही मेरे राज्य का भविष्य होगा! हम एक निर्दोष की बलि देकर नहीं, बल्कि प्रेम, न्याय और विश्वास के मार्ग पर चलकर अपनी संतान की कामना करेंगे।”

प्रजा जय-जयकार करती है। तांत्रिक और दरबारी आश्चर्य और पश्चाताप से भर जाते हैं।

कभी-कभी, जब सारी दुनिया आपको अकेला छोड़ देती है… जब हर दरवाज़ा बंद हो जाता है… तब भी एक ऐसी शक्ति होती है जो आपका हाथ थामे रहती है। वह शक्ति है — ईश्वर। वह आख़िरी उम्मीद है जो कभी धुंधली नहीं पड़ती।

जब सारे सहारे टूट जाएँ, जब हर अपना पराया लगे… तो एक अंतिम सहारा हमेशा मौजूद रहता है — आख़िरी भरोसा… और वह भरोसा, सच्चा भरोसा, कभी टूटता नहीं। वह हमें सिखाता है कि सच्ची शक्ति बाहरी धन-दौलत या रिश्तों में नहीं, बल्कि हमारे भीतर की अटूट आस्था में निहित है। और यही आस्था हमें हर मुश्किल से पार लगाती है।

नैतिक: यह कहानी हमें सिखाती है कि सच्चा भरोसा बाहरी सहारे या सांसारिक इच्छाओं में नहीं, बल्कि ईश्वर और अपनी अटूट आस्था में रखना चाहिए। जब सब साथ छोड़ दें, तो भी परमात्मा का साथ हमेशा बना रहता है। इसके अलावा, यह कहानी स्वार्थ और अंधविश्वास के खतरों पर भी प्रकाश डालती है और एक राजा को भी एक छोटे से बच्चे से न्याय, करुणा और सच्ची भक्ति का पाठ सीखने की प्रेरणा देती है।


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