भगवान शिव के छः पुत्र
भगवान शिव के छः पुत्र
आपने भगवान विष्णु के पुत्रों—आनंद, कर्दम, श्रीद, और चिक्लीत—के बारे में सुना होगा। विष्णु ने भृगु ऋषि की पुत्री लक्ष्मी से विवाह किया था, और उनके ये चार पुत्र हुए। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि भगवान शिव के पुत्र कौन थे?
शिव ने ब्रह्मा के पुत्र दक्ष की कन्या सती से विवाह किया था, लेकिन सती ने अपने पिता द्वारा किए गए अपमान से दुखी होकर यज्ञ की अग्नि में आत्मदाह कर लिया। यह घटना देवताओं के इतिहास में बहुत ही महत्वपूर्ण मोड़ थी। शिव ने सती के जाने के बाद गहरे ध्यान में लीन होकर सृष्टि से अपना संबंध लगभग समाप्त कर लिया।
लेकिन सती ने अगले जन्म में पार्वती के रूप में जन्म लिया। हिमालय की पुत्री उमा ने कठोर तपस्या कर शिव को फिर से प्राप्त किया और इस बार उनका गृहस्थ जीवन आरंभ हुआ। पार्वती के साथ शिवजी के कई पुत्र हुए, जिनमें प्रमुख छह के बारे में हम विस्तार से जानेंगे।
१. गणेश – प्रथम पूज्य
गणेश, जिन्हें विघ्नहर्ता और बुद्धि के देवता के रूप में पूजा जाता है, शिव-पार्वती के सबसे प्रिय पुत्र हैं। गणेश जी के जन्म की कथा बहुत अनोखी है।
एक दिन पार्वती जी ने स्नान के दौरान अपने शरीर के उबटन से एक बालक की रचना की और उसमें प्राण डाल दिए। उन्होंने उस बालक को द्वारपाल बना दिया और आदेश दिया कि कोई भी भीतर न आए। जब भगवान शिव आश्रम लौटे और प्रवेश करना चाहा, तो इस बालक ने उन्हें रोक दिया। शिव को ग़ुस्सा आ गया और उन्होंने अपने त्रिशूल से उसका सिर काट दिया।
जब पार्वती जी ने यह दृश्य देखा, तो वे अत्यंत दुखी हो गईं। उन्हें प्रसन्न करने के लिए शिव ने आदेश दिया कि जो भी प्राणी सबसे पहले मिलेगा, उसका सिर लाकर इस बालक के धड़ पर लगाया जाए। संयोग से एक हाथी का बच्चा सबसे पहले मिला, और उसका सिर बालक के शरीर से जोड़ दिया गया। इस प्रकार गणेश जी ‘गजानन’ कहलाए।
२. कार्तिकेय – देवसेना के सेनापति
शिव-पार्वती के दूसरे पुत्र कार्तिकेय को दक्षिण भारत में मुरुगन, सुब्रमण्यम और स्कंद नाम से भी जाना जाता है। वे अत्यंत पराक्रमी और देवताओं की सेना के सेनापति थे।
कहते हैं कि जब शिवजी गहरे ध्यान में थे, तब असुर तारकासुर ने तीनों लोकों में आतंक मचा रखा था। उसे वरदान था कि केवल शिव-पुत्र ही उसका वध कर सकता है। लेकिन उस समय शिव-पार्वती का विवाह भी नहीं हुआ था। देवताओं की प्रार्थना पर शिव-पार्वती का मिलन हुआ और कार्तिकेय का जन्म हुआ।
एक अन्य कथा के अनुसार, कार्तिकेय का जन्म ६ अप्सराओं के गर्भ से हुआ था। बाद में वे सभी छह शिशु एक हो गए और इसलिए उन्हें षडानन (छह सिर वाले) भी कहा जाता है।
कार्तिकेय ने तारकासुर का वध कर देवताओं को उनका स्थान वापस दिलाया।
३. सुकेश – अनाथ से राजा तक का सफर
सुकेश का जन्म एक बहुत ही विचित्र परिस्थितियों में हुआ था। उनके माता-पिता ने उन्हें त्याग दिया था, और वे लावारिस घूम रहे थे। एक दिन भगवान शिव और माता पार्वती की नजर उन पर पड़ी, और वे इतने मासूम और सुंदर थे कि माता-पिता ने उन्हें गोद ले लिया।
बड़े होने पर सुकेश ने गंधर्व कन्या देववती से विवाह किया, और उनके तीन पुत्र हुए—माल्यवान, सुमाली और माली। ये तीनों आगे चलकर राक्षस कुल के प्रतिष्ठित राजा बने और उनके नाम इतिहास में अमर हो गए।
४. जलंधर – शिव का ही अंश, लेकिन शत्रु
शिवजी का चौथा पुत्र जलंधर था, जो आगे चलकर उनका सबसे बड़ा विरोधी बन गया। कहा जाता है कि शिवजी ने एक बार अपना तेज समुद्र में प्रवाहित किया, जिससे जलंधर का जन्म हुआ। वह एक अपार शक्तिशाली असुर बना, जिसने इंद्र, यमराज और अन्य देवताओं को पराजित कर तीनों लोकों पर शासन किया।
जलंधर की शक्ति का रहस्य उसकी पत्नी वृंदा थी, जो एक पतिव्रता नारी थी। उसके सतीत्व के कारण देवता भी जलंधर को हरा नहीं पा रहे थे। अंततः भगवान विष्णु ने छल से वृंदा का सतीत्व भंग किया, जिससे जलंधर की शक्ति समाप्त हो गई और शिवजी ने उसका वध कर दिया।
कहते हैं कि वृंदा की राख से ही तुलसी का जन्म हुआ, और तभी से तुलसी भगवान विष्णु को अर्पित की जाती है।
५. अयप्पा – हरिहर पुत्र
भगवान अयप्पा का जन्म शिव और विष्णु के मोहिनी रूप से हुआ था। विष्णु जब मोहिनी रूप धारण किए हुए थे, तब शिव उनके आकर्षण में बंध गए और उनके वीर्य से अयप्पा का जन्म हुआ।
दक्षिण भारत में अयप्पा को बहुत पूजा जाता है, विशेष रूप से केरल के सबरीमाला मंदिर में। उन्हें हरिहरपुत्र कहा जाता है क्योंकि वे शिव और विष्णु के संयोग से जन्मे थे।
६. भौम – मंगल ग्रह के स्वामी
एक बार शिवजी ध्यान में लीन थे, तभी उनके ललाट से पसीने की तीन बूंदें पृथ्वी पर गिरीं। उन बूंदों से एक सुंदर बालक उत्पन्न हुआ, जिसका रंग रक्त के समान था और जिसके चार भुजाएँ थीं।
पृथ्वी ने इस बालक का पालन-पोषण किया, और इस कारण वह ‘भौम’ कहलाया। आगे चलकर उसने शिवजी की कठोर तपस्या की, जिससे प्रसन्न होकर शिवजी ने उसे मंगल लोक प्रदान किया। यही भौम आगे चलकर मंगल ग्रह के देवता बने।
अंतिम विचार
शिवजी के ये छह पुत्र अलग-अलग शक्तियों और गुणों के प्रतीक हैं। गणेश बुद्धि और मंगल के देवता बने, कार्तिकेय पराक्रम के, सुकेश नीतिकुशल राजा के, जलंधर अहंकार और शक्ति के, अयप्पा आध्यात्मिक शक्ति के, और भौम तपस्या के प्रतीक बने।
यह कथाएँ केवल धार्मिक कहानियाँ नहीं हैं, बल्कि जीवन के गहरे संदेश भी देती हैं—बुद्धि, वीरता, निष्ठा, शक्ति, भक्ति, और तपस्या के महत्व को दर्शाती हैं। भगवान शिव और उनके पुत्रों की ये गाथाएँ हमें सिखाती हैं कि सही मार्ग पर चलने वाला ही सच्ची विजय प्राप्त करता है।
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