कर भला तो हो भला

 कर भला तो हो भला

जटायु और भीष्म पितामह 

प्रस्तावना

भारतीय संस्कृति में धर्म और कर्म के सिद्धांतों का गहरा महत्व है। रामायण और महाभारत जैसे महान ग्रंथों में ऐसे अनेक चरित्र और घटनाएं हैं जो हमें इन सिद्धांतों की गहराई को समझने में मदद करती हैं। प्रस्तुत कथा जटायु और भीष्म पितामह के जीवन के दो महत्वपूर्ण प्रसंगों पर आधारित है, जो हमें यह सिखाते हैं कि शक्ति, ज्ञान और वरदान से भी अधिक महत्वपूर्ण है धर्म के प्रति हमारी निष्ठा और अन्याय के विरुद्ध हमारी आवाज। यह कहानी हमें 'कर भला तो हो भला' के शाश्वत सत्य को विभिन्न दृष्टिकोणों से समझने में मदद करती है।

जटायु: एक साधारण पक्षी का असाधारण धर्म

दृश्य 1: अपहरण और संकल्प

आकाश में रावण का भयानक पुष्पक विमान उड़ रहा था। विमान में बैठी माता सीता भय और शोक से व्याकुल थीं। नीचे, दंडकारण्य के शांत वन में, एक वृद्ध गिद्ध अपनी कमजोर नजरों से आकाश की ओर देख रहा था। यह जटायु था, जो कभी सूर्य के सारथी अरुण का पुत्र और पक्षियों का महान राजा हुआ करता था, लेकिन अब वृद्धावस्था और शारीरिक दुर्बलता से घिरा था।

जटायु (स्वगत): "यह कैसा दृश्य है? यह दुष्ट रावण, मिथिला के राजा जनक की प्यारी पुत्री का हरण करके ले जा रहा है! मैं जानता हूँ कि मैं अब दुर्बल हूँ, इस शक्तिशाली राक्षस का सामना करने में असमर्थ हूँ। फिर भी, क्या मेरा कर्तव्य मुझे मौन रहने की अनुमति देता है? नहीं! अन्याय को देखकर चुप रहना अधर्म है। जब तक मेरे शरीर में प्राण हैं, मैं अपनी शक्ति के अनुसार प्रयास अवश्य करूँगा।"

अपने दृढ़ संकल्प के साथ, जटायु ने अपने पुराने, कमजोर पंखों को फैलाया और आकाश की ओर उड़ान भरी। उसकी गति धीमी थी, लेकिन उसके हृदय में धर्म का तेज था।

दृश्य 2: धर्मयुद्ध और पराजय

जटायु ने रावण के विमान के सामने आकर उसे रोकने का प्रयास किया। उसने अपनी चोंच और पंजों से रावण पर आक्रमण किया। रावण, आश्चर्य और क्रोध से भर गया। एक वृद्ध पक्षी द्वारा इस प्रकार चुनौती दिए जाने पर वह अपमानित महसूस कर रहा था। दोनों के बीच भयंकर युद्ध हुआ। जटायु ने अपनी पूरी शक्ति लगा दी, लेकिन रावण के बल और माया के सामने वह टिक नहीं सका। अंततः, रावण ने अपने तीक्ष्ण बाणों से जटायु के दोनों पंख काट दिए। लहूलुहान जटायु असहाय होकर धरती पर गिर पड़ा।

दृश्य 3: मृत्यु और कर्तव्य

धरती पर गिरे हुए, पीड़ा से कराहते जटायु के सामने मृत्यु के देवता, काल, प्रकट हुए।

काल: "हे गिद्धराज, तुम्हारा समय पूरा हो गया है। तुम्हारा शरीर अब तुम्हारा साथ नहीं देगा। मेरे साथ चलो।"

जटायु (शांत लेकिन दृढ़ स्वर में): "मैं मृत्यु को स्वीकार करूँगा, लेकिन अभी नहीं। जब तक मैं यह दुखद समाचार प्रभु श्रीराम तक नहीं पहुँचा देता, मृत्यु मुझे स्पर्श नहीं कर सकती। अपने कर्तव्य का पालन किए बिना मैं अपने प्राण नहीं त्याग सकता।"

काल (हैरान होकर): "तुम एक साधारण पक्षी हो, न कोई ऋषि, न कोई महान योद्धा। फिर भी तुम मृत्यु को आदेश दे रहे हो?"

जटायु: "धर्म का पालन किसी विशेष जाति, वंश या शक्ति का मोहताज नहीं होता। यह हर आत्मा का परम दायित्व है। और मैं, एक तुच्छ पक्षी होकर भी, अपने धर्म से विमुख नहीं हो सकता।"

काल, जटायु के दृढ़ निश्चय और धर्म के प्रति उसके अटूट समर्पण को देखकर विस्मय से खड़ा रह गया। कुछ समय पश्चात, वन में भटकते हुए श्रीराम और लक्ष्मण उस स्थान पर पहुँचे जहाँ जटायु घायल पड़ा था।

श्रीराम (जटायु को देखकर): "हे गिद्धराज! यह आपकी कैसी दशा है? किसने आपको इस प्रकार घायल किया?"

जटायु (धीरे से, शांत स्वर में): "प्रभु... रावण... माता सीता को हरण करके ले गया... मैंने उसे रोकने का प्रयास किया... पर वह अत्यंत बलवान था... अब आप जान गए हैं, इसलिए अब मैं अपने कर्तव्य से मुक्त हूँ।"

यह कहते ही, श्रीराम की गोद में लेटे हुए जटायु ने शांतिपूर्वक अपने प्राण त्याग दिए।

श्रीराम (शोक और सम्मान से भरे स्वर में): "हे महान पक्षी! आपने जो किया, वह तो देवता भी नहीं कर सकते थे। आपका यह बलिदान अमर रहेगा। आप धर्म के लिए लड़े और अपने प्राणों का मोह त्याग दिया।"

श्रीराम ने स्वयं जटायु का अंतिम संस्कार किया, उसे वह सम्मान दिया जो एक पुत्र अपने पिता को देता है।

भीष्म पितामह: शक्ति और ज्ञान का मौन

दृश्य 1: युद्ध की समाप्ति और पश्चाताप

महाभारत का भीषण युद्ध समाप्त हो चुका था। कौरवों की हार हुई थी और पांडवों ने धर्म की स्थापना की थी। युद्ध में अर्जुन के बाणों से बिंधे हुए भीष्म पितामह, इच्छा मृत्यु के वरदान के कारण अभी भी जीवित थे और बाणों की शय्या पर उत्तरायण की प्रतीक्षा कर रहे थे। उनके चारों ओर कृष्ण, युधिष्ठिर और अन्य पांडव खड़े थे, उनके प्रति सम्मान और चिंता से भरे हुए।

कृष्ण (भीष्म से): "पितामह, क्या आपके शरीर की पीड़ा अब भी असहनीय है?"

भीष्म (गहरी पीड़ा के साथ): "शरीर की पीड़ा तो सहनीय है, माधव... लेकिन मेरे मन की पीड़ा असह्य है। मैंने जीवन भर धर्म की रक्षा का संकल्प लिया, न्याय और सत्य के मार्ग पर चलने का प्रयास किया, पर एक ऐसा क्षण आया जब मैं मौन रहा... द्रौपदी का चीरहरण होते समय मैंने अपनी आँखें बंद कर ली थीं। मेरे बाणों की यह शय्या उसी मौन का परिणाम है।"

दृश्य 2: धर्म की आत्मा और नियमों का बंधन

कृष्ण (शांत लेकिन भेदक स्वर में): "आपने नियमों का पालन किया, पितामह। आपने अपनी प्रतिज्ञा निभाई, लेकिन आपने धर्म की आत्मा की उपेक्षा की। धर्म केवल नियमों और प्रतिज्ञाओं का पालन करने का नाम नहीं है, बल्कि अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाने का साहस भी है। आपका मौन केवल आत्मरक्षा नहीं था—उस समय वह अन्याय की स्वीकृति बन गया था।"

भीष्म: "मुझे इच्छा मृत्यु का वरदान प्राप्त था, केशव... फिर भी मैं इस असह्य पीड़ा में क्यों हूँ? क्या मेरे तप और त्याग का कोई मूल्य नहीं?"

कृष्ण: "क्योंकि धर्म केवल प्रतिज्ञाओं का निर्वाह नहीं है, पितामह। वह न्याय की पुकार पर खड़े होने का साहस है, भले ही वह आपकी व्यक्तिगत प्रतिज्ञाओं या सामाजिक मर्यादाओं के विरुद्ध ही क्यों न हो। आप महान हैं, इसमें कोई संदेह नहीं—लेकिन यह बाणों की शय्या इस बात की स्मृति है कि जब धर्म को आपकी आवाज की आवश्यकता थी, तब आप मौन थे।"

भीष्म पितामह मौन रह गए, कृष्ण के वचनों की गहराई को महसूस करते हुए। उनकी शक्ति और ज्ञान, उस महत्वपूर्ण क्षण में धर्म के पक्ष में खड़े होने के साहस की कमी के कारण, उन्हें शांति और मुक्ति नहीं दिला सके।

निष्कर्ष: सूत्रधार का कथन

दृश्य 3: नैतिक संदेश

सूत्रधार (शांत और गूढ़ स्वर में):

"जटायु—एक साधारण पक्षी—जिसके पास न शक्ति थी, न वरदान, परन्तु उसने धर्म के लिए संघर्ष किया।

भीष्म—एक महाबली योद्धा—जिसके पास अपार शक्ति, ज्ञान और इच्छा मृत्यु का वरदान था, परन्तु धर्म के समय वह मौन रहा।

एक को मृत्यु भी छूने से डरती है, क्योंकि उसने अपने तुच्छ जीवन को भी धर्म के लिए समर्पित कर दिया।

दूसरा मृत्यु को बुलाता है, परन्तु वह विलंब करती है, क्योंकि उसके मौन ने उसके महान कर्मों को भी धूमिल कर दिया।

शक्ति, बुद्धि और वरदान—तभी तक मूल्यवान हैं, तभी तक सार्थक हैं,

जब तक वे धर्म की सेवा में समर्पित हैं।

इसलिए सत्य ही कहा गया है—

जो अन्याय देखकर भी चुप रहते हैं,

उनकी गति अंततः बाणों की शय्या पर होती है—पीड़ा और पश्चाताप से भरी हुई।

और जो धर्म के लिए अपनी सीमा जानते हुए भी संघर्ष करते हैं,

उनका अंत प्रभु की गोद में होता है—शांति और सम्मान के साथ।

कर भला तो हो भला,

यह केवल एक साधारण कहावत नहीं—यह जीवन का शाश्वत सिद्धांत है।"

नैतिक शिक्षा (Moral of the Story)

इस कथा से हमें निम्नलिखित नैतिक शिक्षाएँ मिलती हैं:

 * कर्म ही प्रधान है: व्यक्ति का कर्म उसकी पहचान और उसके अंत को निर्धारित करता है, न कि उसकी शक्ति, पद या प्रतिष्ठा। जटायु ने अपनी दुर्बलता के बावजूद धर्म के लिए कर्म किया और सम्माननीय मृत्यु प्राप्त की।

 * अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाना कर्तव्य है: धर्म का पालन केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है, बल्कि अन्याय को देखकर उसके विरुद्ध आवाज उठाना भी परम कर्तव्य है। भीष्म पितामह का मौन उन्हें पीड़ा और पश्चाताप का कारण बना।

 * निष्क्रियता भी अपराध है: अन्याय होते हुए चुप रहना भी अन्याय का समर्थन करने जैसा है। हमारी निष्क्रियता उन लोगों को और अधिक अन्याय करने के लिए प्रोत्साहित कर सकती है।

 * सच्चा बलिदान अमर होता है: जटायु ने अपने प्राणों की परवाह किए बिना सीता माता की रक्षा का प्रयास किया। उसका यह बलिदान उसे अमर बना गया।

 * शक्ति का सदुपयोग: शक्ति, ज्ञान और वरदान तभी सार्थक हैं जब उनका उपयोग धर्म और न्याय की स्थापना के लिए किया जाए। यदि इनका उपयोग अन्याय के समय मौन रहने या उसका समर्थन करने के लिए किया जाए, तो यह व्यर्थ हो जाते हैं।

संक्षेप में, यह कथा हमें सिखाती है कि 'कर भला तो हो भला' का सिद्धांत केवल दूसरों के प्रति दयालुता दिखाने तक सीमित नहीं है, बल्कि अन्याय के विरुद्ध खड़े होने और धर्म के मार्ग पर चलने में भी निहित है। हमारे कर्म, चाहे छोटे हों या बड़े, हमारे जीवन और मृत्यु को अर्थ और सम्मान प्रदान करते हैं।


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