अष्टम नवरात्र – माँ महागौरी की कथा


नवरात्रि का आठवां दिन माँ दुर्गा के आठवें स्वरूप माँ महागौरी को समर्पित है। उनका स्वरूप दूध की तरह उज्जवल, पूर्णिमा के चंद्रमा जैसा शीतल, और आभा से चमकता हुआ होता है। वे शांति, पवित्रता और भक्ति की मूर्ति हैं। पर क्या हम जानते हैं कि इस प्रकाशमय सौंदर्य के पीछे एक अत्यंत कठोर तप और दिव्य प्रेम की लंबी यात्रा छुपी है?


देवी पार्वती का जन्म 


जब देवी सती ने अपने पिता दक्ष के अपमान से आहत होकर आत्मदाह किया, तब उनका शरीर भले नष्ट हो गया, लेकिन उनकी आत्मा, आदि शक्ति, अमर थी। उन्होंने हिमालयराज और रानी मेनका के घर पुनर्जन्म लिया – इस बार पार्वती के रूप में। बचपन से ही उनमें एक विशेष आध्यात्मिक आकर्षण था – एक आंतरिक पुकार, जो उन्हें लगातार भगवान शिव की ओर खींच रही थी।




जैसे-जैसे पार्वती बड़ी हुईं, उन्हें यह बोध हुआ कि वे पूर्व जन्म में स्वयं शिव की अर्धांगिनी थीं। उन्होंने निश्चय कर लिया कि इस जन्म में भी वे उन्हीं को पति रूप में प्राप्त करेंगी। इसके लिए उन्होंने संसारिक सुखों का त्याग किया – महल, आभूषण, रेशमी वस्त्र – सब कुछ पीछे छोड़कर एक तपस्विनी के रूप में हिमालय के वनों में चली

उनकी तपस्या अकल्पनीय थी। वर्षों नहीं, युगों तक उन्होंने ध्यान और साधना की।


  • पहले फल, फिर गिरे हुए पत्तों पर जीवन यापन।
  • फिर उन्होंने वायु पर ही जीना शुरू किया।
  • उनका शरीर दुर्बल हो गया, चमड़ी पर धूल-मिट्टी जम गई, चेहरा काला पड़ गया।
  • उनकी आँखों में गहराई थी – वो आत्मा की पुकार थी।



पार्वती का यह तप तीनों लोकों में चर्चा का विषय बन गया। देवता भी उनकी भक्ति से चकित थे। ऋषियों का ध्यान भी भंग होने लगा, ब्रह्मांड की गति जैसे रुक सी गई।




जब भगवान शिव ने देखा कि यह कोई सामान्य तप नहीं, बल्कि आत्मा की पुकार है, तो उन्होंने पार्वती की परीक्षा लेने का निश्चय किया। वे एक वृद्ध ब्राह्मण का वेश धारण कर उनके पास पहुँचे और कहा:


“तुम इतने कष्ट क्यों सह रही हो? किसके लिए यह तप?”


जब पार्वती ने कहा कि वे शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए तप कर रही हैं, उन्होंने तिरस्कार करते हुए शिव का वर्णन किया –

“श्मशान में रहने वाला, सर्प पहनने वाला, भूतों संग विचरण करने वाला – वह तुम्हारे योग्य नहीं!”


पर पार्वती अडिग रहीं। उन्होंने दृढ़ता से कहा:

“शिव ही मेरे स्वामी हैं। चाहे वे मुझे स्वीकार करें या नहीं, मेरा मन तो उन्हीं का है। और मैं उन्हीं को पति रूप में चाहती हूँ – अन्यथा जीवन भर अविवाहित रहूँगी।”



पार्वती की अडिग निष्ठा और प्रेम से प्रसन्न होकर शिव अपने वास्तविक रूप में प्रकट हुए और उन्हें स्वीकार किया।


उन्होंने देखा कि पार्वती का रूप तप के कारण मलिन हो चुका था। उन्होंने अपनी जटाओं से गंगा जल लिया और पार्वती पर डाला। जैसे ही वह जल उनके शरीर पर पड़ा, एक अद्भुत परिवर्तन हुआ — उनका संपूर्ण शरीर शुद्ध हो गया, रूप दूध से भी अधिक श्वेत हो गया, आभा से दिशाएं चमक उठीं।


इसी अलौकिक रूप में वे महागौरी कहलाईं – ‘महा’ यानी महान, ‘गौरी’ यानी गौर वर्ण वाली – अत्यंत उज्ज्वल, शुद्ध और शांत।








माँ महागौरी को वृषभ (बैल) पर सवार दर्शाया जाता है। उनके चार हाथ होते हैं – जिनमें त्रिशूल, डमरू, और वरमुद्रा व अभयमुद्रा होती हैं। उनका श्वेत वस्त्र, श्वेत आभा, और शांत मुस्कान – सबकुछ एक दिव्य पवित्रता का प्रतीक है।


उनकी कथा हमें यह सिखाती है:


  • प्रेम की शक्ति – सच्चा प्रेम त्याग मांगता है।
  • भक्ति की गहराई – शरीर की नहीं, आत्मा की सुंदरता महत्त्व रखती है।
  • दृढ़ निश्चय – कठिन तप से ही सच्ची सिद्धि मिलती है।






नवरात्रि में माँ महागौरी की पूजा का 



समापन – एक प्रेरणा



माँ महागौरी की कथा केवल एक देवी की गाथा नहीं, यह प्रत्येक साधक की यात्रा है – अंधकार से प्रकाश की ओर, तपस्या से सिद्धि की ओर, मलिनता से पवित्रता की ओर।


जो भी भक्ति और श्रद्धा से माँ की आराधना करता है, उसके भीतर भी वही महागौरी की तेजस्विता जाग उठती है।




जय माँ महागौरी! 


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