कामदा एकादशी

कामदा एकादशी 


चैत्र शुक्ल पक्ष की एकादशी—जिसका नाम है कामदा एकादशी।

यह केवल एक व्रत नहीं, बल्कि प्रेम, तपस्या और उद्धार की वह यात्रा है… जिसमें एक स्त्री अपने पतिव्रत प्रेम से अपने पति को राक्षसत्व से मुक्त करा लेती है।


यह कथा हमें बताती है—कि प्रेम जब समर्पण बन जाए, तो विधाता भी झुक जाते हैं।




युधिष्ठिर और श्रीकृष्ण का संवाद


राजा युधिष्ठिर विनम्र भाव से श्रीकृष्ण के चरणों में झुके और बोले:


युधिष्ठिर:

“हे जनार्दन! हे मधुसूदन! कृपा करके बताइए, चैत्र शुक्ल पक्ष की एकादशी कौन सी है? उसका क्या महात्म्य है?”


श्रीकृष्ण मुस्कराए, और बोले:


श्रीकृष्ण:

“राजन्! तुमने बहुत सुंदर प्रश्न किया है। यह व्रत अत्यंत पुण्यदायक है। इसे सुनने मात्र से भी पाप नष्ट होते हैं।

यह वही व्रत है जिसकी कथा वशिष्ठ ऋषि ने राजा दिलीप को सुनाई थी। अब तुम एकाग्र होकर सुनो…”




 नागपुर नगरी – एक दिव्य भूमि


बहुत समय पहले की बात है।

एक दिव्य नगरी थी—नागपुर, जहाँ सोने के महल, गंधर्वों की संगीत लहरियाँ, और अप्सराओं की मोहिनी छाया बसी रहती थी।

वहाँ का राजा था—पुण्डरीक नाग, और उसके दरबार में रहते थे अनेक गंधर्व, अप्सराएँ, और किन्नर।


वहीं रहते थे दो सुंदर गंधर्व—ललित और ललिता।

वे दोनों पति-पत्नी थे। परंतु उनका प्रेम कोई साधारण प्रेम नहीं था…

वह आत्मा से आत्मा का जुड़ाव था।


ललिता के हृदय में बस एक ही चित्र था—अपने प्रिय ललित का।

और ललित? उसके गीतों में, उसकी साँसों में, हर स्वर में—बस ललिता ही बसी थी।




 सभा में संकट


एक दिन, नागराज पुण्डरीक की राजसभा में संगीत सभा हो रही थी।

गंधर्व ललित वहाँ गा रहे थे… पर उस दिन ललिता वहाँ उपस्थित नहीं थी।


गाते-गाते अचानक ललित को अपनी पत्नी की याद आ गई।

उसका स्वर लड़खड़ा गया, उसकी वीणा की गति रुक गई।


कर्कोटक नाग, जो एक चतुर दरबारी था, राजा से बोला:


कर्कोटक:

“महाराज! ललित का मन गीत में नहीं है। शायद वह अपनी पत्नी की याद में खो गया है।”


राजा पुण्डरीक क्रोधित हुए। उन्होंने सिंहासन से उठते हुए गर्जना की:


राजा पुण्डरीक:

“हे दुर्बुद्धि! राजसभा में भी प्रेम की मदिरा पीकर आया है?

तू राक्षस बन जा! यही तेरी सज़ा है!”


राजा का श्राप लगते ही ललित का दिव्य रूप नष्ट हो गया।

वह एक भयंकर राक्षस बन गया—भयानक मुख, लाल आँखें, विकराल शरीर!




पत्नी का प्रेम और तपस्या


ललिता, जो कहीं और थी, जब उसे पता चला कि उसके पति को श्राप लगा है—तो वह रोती हुई जंगल की ओर भागी।

राक्षसी काया वाले अपने पति को देख… उसका हृदय चीत्कार कर उठा।


ललिता (स्वगत):

“हे देव! ये मेरे स्वामी हैं? ये विकराल रूप?

मैं क्या करूँ? किससे सहायता माँगू? कौन मुझे मार्ग दिखाए?”


वह भटकती रही, रोती रही… और अंततः एक दिव्य आश्रम के निकट पहुँची।




 ऋषि का मार्गदर्शन


उस आश्रम में विराजमान थे—शांत, तेजस्वी, तपस्वी ऋषि।

उन्होंने ललिता को देखकर करुणा से पूछा:


ऋषि:

“कौन हो बेटी? यह अश्रुधारा क्यों? अपने हृदय का भार मुझ पर उतारो।”


ललिता ने सारा वृत्तांत सुनाया। अपनी पीड़ा, अपने प्रेम और अपने पति के शाप का उल्लेख किया।


ऋषि बोले:

“बेटी, आज चैत्र शुक्ल एकादशी है, इसका नाम है कामदा एकादशी।

तू इसका व्रत कर, और जो पुण्य प्राप्त हो—उसे अपने पति को अर्पित कर दे।

तेरा प्रेम, तेरा तप—विधाता को भी बाध्य कर देगा।”




व्रत और उद्धार


ललिता ने विधिपूर्वक व्रत किया—उपवास रखा, भगवान वासुदेव की पूजा की, और द्वादशी को प्रार्थना की:


ललिता (प्रभु से):

“हे वासुदेव!

मैंने जो भी पुण्य इस व्रत से अर्जित किया है, वह मैं अपने पति को अर्पित करती हूँ।

उनका राक्षस रूप समाप्त हो, और उन्हें पूर्व गंधर्व स्वरूप प्राप्त हो!”


कथा कहती है—

उस क्षण जैसे ही ललिता ने यह प्रार्थना की…

ललित का राक्षस रूप जलकर भस्म हो गया… और वह पुनः दिव्य रूप में प्रकट हो गया।


अब वह पहले से भी अधिक तेजस्वी था।


दोनों पति-पत्नी विमान पर आरूढ़ हुए

और अप्सराओं की मधुर गंध लेकर स्वर्गलोक की ओर प्रस्थान कर गए।




भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं:


“राजन्!

कामदा एकादशी का व्रत ब्रह्महत्या जैसे पापों का भी नाश करता है।

जो इसे करता है—या सुनता है—उसे वाजपेय यज्ञ के बराबर पुण्य प्राप्त होता है।”





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