अज्ञानता और लोभ का परिणाम
अज्ञानता और लोभ का परिणाम
रामपुर गाँव के बाहरी इलाके में, जहाँ सुबह पक्षियों की चहचहाहट और हल्की ठंडी हवा खेतों में बहती थी, वहीं एक कुम्हार, रामू, अपनी मिट्टी के बर्तनों के लिए मशहूर था। उसकी दिनचर्या साधारण थी—सूरज की पहली किरण के साथ उठना, मिट्टी खोदना, चाक पर बर्तन गढ़ना और फिर उन्हें बेचने के लिए बाज़ार जाना।
एक दिन, जब रामू खेत के किनारे मिट्टी खोद रहा था, उसकी कुदाल अचानक किसी कठोर चीज़ से टकराई। “धप!” एक अजीब सी आवाज़ आई। उसने उत्सुकता से मिट्टी हटाई, तो देखा—एक चमकता हुआ पत्थर!
“अरे! यह कितना सुंदर है!” उसने उसे हाथ में उठाकर ध्यान से देखा। वह सूरज की रोशनी में इंद्रधनुषी रंगों में चमक रहा था। लेकिन रामू, जो सिर्फ मिट्टी और घड़ों की कीमत समझता था, इस अनमोल रत्न की असली कीमत नहीं पहचान पाया।
“यह तो बड़ा सुंदर है… मेरे गधे के गले में अच्छा लगेगा!” उसने सोचा और एक रस्सी से उसे अपने गधे के गले में बाँध दिया। अब जब भी रामू का गधा गाँव की गलियों से गुजरता, पत्थर सूरज की रोशनी में चमकता और लोगों का ध्यान आकर्षित करता।
गाँव में लाला धनीराम नाम का एक बनिया था, जिसकी दुकान पर रोज़ाना ग्राहकों की भीड़ लगी रहती थी। एक दिन, जब वह रामू से कुछ मिट्टी के बर्तन खरीदने आया, तो उसकी नज़र गधे के गले में लटकते उस पत्थर पर पड़ी।
“रामू, यह पत्थर कहाँ से लाया?” उसने जिज्ञासा से पूछा।
“मिट्टी खोदते वक़्त मिला था। अच्छा लगा, तो गधे के गले में बाँध दिया,” रामू ने बेपरवाही से कहा।
बनिए को वह चमकीला पत्थर आकर्षक लगा। उसने सोचा, “यह मेरी तराजू की शोभा बढ़ाएगा।”
“बेचोगे क्या?”
रामू को पैसों की ज़रूरत थी, लेकिन उसे इस पत्थर की असली कीमत का अंदाज़ा नहीं था। उसने सोचा, “अगर मुझे इसके बदले थोड़ा गुड़ मिल जाए, तो अच्छा रहेगा।”
“सवा सेर गुड़ दे दो, और इसे ले जाओ,” रामू ने कहा।
बनिए को यह सौदा फायदेमंद लगा। उसने तुरंत सवा सेर गुड़ रामू को दिया और वह पत्थर लेकर चला गया। उसने उसे अपनी तराजू की डंडी से बाँध दिया। अब वह हर दिन अपने व्यापार में इसका इस्तेमाल करता, लेकिन उसे इसकी असली कीमत का पता ही नहीं था।
एक दिन, गाँव में एक जौहरी, प्रकाश चंद, व्यापार के सिलसिले में आया। वह एक अनुभवी आदमी था और कीमती रत्नों की पहचान करने में माहिर था। जब उसने लाला धनीराम की दुकान पर तराजू देखा, तो उसकी आँखें चमक उठीं।
“यह तो बेशकीमती हीरा है!” उसने मन ही मन सोचा।
परंतु बाहर से उसने अपनी भावनाएँ छिपा लीं और बनिए से यूँ ही पूछा, “यह पत्थर कितने का दोगे?”
“बस पाँच रुपये,” बनिए ने लापरवाही से कहा।
प्रकाश चंद के अंदर का लालच जाग उठा। “अगर मैं थोड़ी मोल-भाव कर लूँ, तो यह और भी सस्ता मिल सकता है!” उसने सोचा।
“चार रुपये में दोगे?” उसने बनिए से कहा।
बनिए ने इंकार कर दिया। “मैंने इसे सवा सेर गुड़ देकर लिया था, और मैं नुकसान नहीं कर सकता।”
प्रकाश चंद ने सोचा, “इतनी जल्दी क्या है? कल आकर खरीद लूँगा।” उसने बनिए को पाँच रुपये देने का मन बना लिया और दुकान से चला गया।
उसी शाम, गाँव में एक और जौहरी, रमेश, आया। जैसे ही उसने बनिए की तराजू पर चमकते हीरे को देखा।
उसकी सांसें तेज़ हो गईं।
“हे भगवान! यह तो असली हीरा है!”
उसने बिना देर किए बनिए से पूछा, “क्या यह पत्थर बिकाऊ है?”
बनिए ने वही पुराना जवाब दिया, “हाँ, पाँच रुपये में ले लो।”
रमेश ने झट से पाँच रुपये निकाले और हीरा खरीद लिया। वह उसे लेकर खुशी-खुशी चला गया, क्योंकि उसे पता था कि उसने एक बेशकीमती खजाना पा लिया है।
अगले दिन, प्रकाश चंद फिर बनिए की दुकान पर आया। उसने पाँच रुपये निकाले और बोला, “लाओ भाई, वह पत्थर दे दो!”
बनिए ने हँसते हुए कहा, “अरे, वह तो कल ही एक दूसरे आदमी ने पाँच रुपये में खरीद लिया।”
यह सुनकर प्रकाश चंद का चेहरा फक पड़ गया। उसका दिल धड़कने लगा।
“अरे मूर्ख! वह कोई साधारण पत्थर नहीं था, बल्कि एक लाख रुपये का हीरा था!” वह गुस्से और पछतावे से चिल्लाया।
बनिए ने मुस्कुराते हुए कहा, “तो फिर मुझसे बड़े मूर्ख तो तुम हुए! मैं तो इसे एक साधारण पत्थर समझकर बेचा था, लेकिन तुम जानते हुए भी इसे सिर्फ़ एक रुपये के लालच में नहीं खरीद सके!”
प्रकाश चंद को अपनी गलती का एहसास हुआ। उसका लालच और देरी करने की आदत उसे भारी पड़ी थी। उसने अपने ही हाथों एक अनमोल हीरा खो दिया था।
कहानी की सीख
हमारी ज़िंदगी में भी ऐसा कई बार होता है। हमें बहुत से “हीरे रूपी व्यक्ति” या अवसर मिलते हैं, लेकिन हम उन्हें पहचान नहीं पाते। कभी हमारी अज्ञानता, कभी अहंकार, तो कभी लालच हमें उनसे दूर कर देता है।
- रामू की तरह, कई बार हम किसी अनमोल चीज़ की कीमत ही नहीं समझ पाते।
- लाला धनीराम की तरह, हम किसी चीज़ की वास्तविकता से अनजान रहते हैं और उसे साधारण मान लेते हैं।
- प्रकाश चंद की तरह, जब हमें सच्चाई पता भी चलती है, तो लालच और समय टालने की आदत हमें नुकसान पहुँचा देती है।
- और रमेश की तरह, जो लोग समय पर सही फैसले लेते हैं, वे जीवन में सफल हो जाते हैं।
इसलिए, जब भी कोई अवसर या अनमोल रिश्ता मिले, उसे पहचानना और सही समय पर सही निर्णय लेना बेहद ज़रूरी है। वरना पछतावे के सिवा कुछ हाथ नहीं आएगा!
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