राहु का रहस्य — क्यों उसका केवल सिर ही जीवित है

राहु का रहस्य — क्यों उसका केवल सिर ही जीवित है


बहुत पुरानी बात है…

जब देवता और दानव दोनों मिलकर समुद्र मंथन कर रहे थे। इस महा प्रयत्न में मंथन से अमूल्य रत्न, दिव्य औषधियाँ और अनेक विचित्र वस्तुएँ तो निकलीं… पर सबकी नजरें केवल एक चीज़ पर टिकी थीं—अमृत।

वो अमृत, जो किसी को भी अमर बना सकता था।


अंततः जब अमृत कलश निकला, तो उसकी प्राप्ति के लिए देवताओं और दानवों में होड़ लग गई।

दानव छल से अमृत कलश छीनकर भाग निकले। देवता घबरा गए—“अगर दानव अमर हो गए, तो अधर्म का साम्राज्य छा जाएगा!”


सभी देवता भागते हुए भगवान विष्णु के पास पहुँचे।

“प्रभु! अब क्या करें? दानव अमृत ले गए हैं!”


भगवान विष्णु मुस्कुराए।

“चिंता मत करो। अमृत पर केवल धर्म का अधिकार है। इसे देवताओं तक पहुँचाना मेरा उत्तरदायित्व है।”


फिर क्या था? भगवान विष्णु ने एक अनुपम, मोहक रूप धारण किया—मोहिनी रूप।

उस रूप की दिव्यता, सौंदर्य और आकर्षण ऐसा था कि बड़े से बड़ा तपस्वी भी उस मोहिनी माया में बंध जाए।


मोहिनी रूप में भगवान दानवों की सभा में पहुँचे।

दानव उस अनुपम सौंदर्य को देख ठगे से रह गए।

मोहिनी ने मुस्कराकर कहा—


“यदि आप चाहें तो मैं निष्पक्ष रूप से अमृत का वितरण कर सकती हूँ।”

मोहिनी की बातों में ऐसा सम्मोहन था कि दानव बिना कोई शंका किए मान गए।


अब मोहिनी ने देवताओं और दानवों को दो पंक्तियों में बिठा दिया।

और चालाकी से अमृत केवल देवताओं को देना प्रारंभ किया।


पर तभी…

एक चालाक दैत्य, जिसका नाम था स्वर्भानु, चुपके से देवताओं का वेश धारण कर उनके बीच में जा बैठा।

उसे पता था कि यदि वह देवताओं की तरह दिखेगा, तो मोहिनी उसे भी अमृत दे देगी।


और वही हुआ…

मोहिनी (जो स्वयं भगवान विष्णु थे), जब अमृत पात्र लेकर आगे बढ़ीं, तो उन्होंने स्वर्भानु को भी अमृत पिला दिया।

पर तभी चंद्रमा और सूर्य, जो सब कुछ देख रहे थे, उन्होंने तुरंत पहचान लिया और कहा—


“प्रभु! यह तो दैत्य है! यह देवता नहीं!”


भगवान विष्णु तुरंत समझ गए।

क्षण भर की देरी किए बिना उन्होंने अपने सुदर्शन चक्र को चलाया—

और स्वर्भानु का सिर धड़ से अलग कर दिया।


पर चौंकाने वाली बात ये हुई कि…

स्वर्भानु ने अमृत का एक घूंट पहले ही पी लिया था!

अमृत का प्रभाव सिर तक पहुँच चुका था—इसलिए उसका सिर अमर हो गया।


उसका धड़ नीचे गिरकर नष्ट हो गया, परंतु सिर आकाश में स्थिर हो गया।


ब्रह्मा जी ने उस अमर सिर को एक विशेष स्थान प्रदान किया—राहु ग्रह के रूप में।


और जहाँ सिर था, वहीं कुछ काल बाद उसका धड़ भी जीवित हो उठा—जिसे कहा गया केतु।


लेकिन राहु… वो कभी नहीं भूला कि सूर्य और चंद्रमा ने उसकी सच्चाई उजागर की थी।


तभी से…

हर पूर्णिमा और अमावस्या को राहु सूर्य और चंद्रमा पर आक्रमण करता है, जिसे हम ग्रहण कहते हैं।

वह क्षणिक रूप से उन्हें निगलता है—परंतु वे फिर निकल आते हैं, क्योंकि वह निगल तो सकता है, पर पूरी तरह समाप्त नहीं कर सकता।




इस कथा की शिक्षा:


  • अधर्म चाहे कितना भी चालाकी से धर्म के वेश में आए, उसकी पहचान समय पर हो ही जाती है।
  • जो छल करता है, उसे उसका परिणाम किसी न किसी रूप में भुगतना पड़ता है।
  • और सबसे महत्वपूर्ण—अमृत केवल शरीर को नहीं, आत्मा के सत्य को अमर करता है।
    अगर तुम्हारा मार्ग अधर्म का है, तो अमृत भी तुम्हें पूर्ण अमरत्व नहीं दे सकता।

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