धन, पुत्र, वही जो परमार्थ में लगे
धन, पुत्र, वही जो परमार्थ में लगे
धर्म और समाज में यह प्रश्न सदैव विचारणीय रहा है कि “हमारा क्या है?”
क्या वह संपत्ति, जो हम अर्जित करते हैं?
क्या वे संतानें, जिन्हें हमने जन्म दिया है?
या वह समय, जो हमने जीया?
प्राचीन भारत की एक कथा इस प्रश्न को तीन सरल सवालों के माध्यम से अत्यंत गहराई से उजागर करती है।
प्राचीन समय में एक नगर में एक धनी सेठ सुरज मल रहते थे। समाज में उनका सम्मान इस कारण से अधिक था कि वे न केवल धनवान थे, अपितु संत-महात्माओं के प्रति सेवा-भाव में सदैव अग्रणी रहते थे। जब भी कोई साधु, संत, या महापुरुष नगर में पधारते, सेठ उन्हें अपने घर आमंत्रित करते, आदरपूर्वक सत्कार करते और भोजनादि की व्यवस्था करते।
एक दिन एक तपस्वी महात्मा नगर में आए। नगरवासियों ने उन्हें बताया कि सेठ जी सदैव संत सेवा के इच्छुक रहते हैं। अतः महात्मा जी को सेठ के घर ले जाया गया। सेठ उस समय किसी व्यापारिक कार्य से बाजार गए हुए थे। घर पर केवल उनकी पत्नी, रमा , उपस्थित थीं। उन्होंने संत को विधिवत स्वागत किया, आसन ग्रहण कराया और भोजन परोसने लगीं।
भोजन के दौरान महात्मा जी ने सहज जिज्ञासावश सेठानी से कुछ प्रश्न किए:
महात्मा जी: “माताजी, आपके कितने पुत्र हैं?”
रमा : “ईश्वर की कृपा से हमारे चार पुत्र हैं।”
महात्मा जी: “आपके पास कितना धन है?”
रमा ): “महाराज! ईश्वर की अनंत कृपा है। लोग हमें लखपति कहते हैं।”
महात्मा जी ने प्रसन्न होकर भोजन किया।
कुछ देर बाद सेठ जी बाजार से लौट आए। उन्होंने महात्मा जी को प्रणाम किया और कहा, “महाराज, आइए, आपको थोड़ा मार्ग तक छोड़ देता हूँ।”
महात्मा जी सहर्ष तैयार हो गए।
मार्ग में चलते हुए महात्मा जी ने सेठ से भी वही प्रश्न पूछे जो उन्होंने सेठानी से पूछे थे।
महात्मा जी: “सेठ जी, आपके कितने पुत्र हैं?”
सेठ: “महाराज, मेरा एक ही पुत्र है।”
महात्मा जी (आश्चर्यचकित): “एक ही? आपकी धर्मपत्नी तो कह रही थीं कि आपके चार पुत्र हैं।”
महात्मा जी (दूसरा प्रश्न): “आपका कितना धन है?”
सेठ: “पच्चीस हज़ार रुपये।”
महात्मा जी (चौंककर सोचने लगे): “यह क्या उत्तर हुआ? सेठानी ने कहा था कि ये लखपति हैं, और अब यह स्वयं अपने धन को केवल पच्चीस हज़ार रुपये बता रहा है।“
महात्मा जी (तीसरा प्रश्न): “आपकी आयु कितनी है?”
सेठ: “चालीस वर्ष।”
महात्मा जी कुछ क्षणों तक निःशब्द रहे। सेठ जी की दाढ़ी सफेद थी, चेहरे पर झुर्रियाँ थीं, देह काठी और चाल में वृद्धावस्था का स्पष्ट संकेत था।
उन्होंने सीधे पूछ ही लिया—
महात्मा जी: “सेठ जी, क्षमा करें, किंतु आपके उत्तरों में मुझे असंगति प्रतीत हो रही है। आपकी धर्मपत्नी कुछ और कहती हैं, आपके आचरण और वाणी में कुछ और सत्य झलकता है। कृपया मुझे स्पष्ट करें—क्या आप सत्य कह रहे हैं?”
सेठ ने दोनों हाथ जोड़कर उत्तर दिया—
सेठ: “महाराज! झूठ बोलना सर्वदा अनुचित है, और संतों के समक्ष तो घोर अपराध है। आपने जो प्रश्न पूछे, उनके उत्तर मैंने अपनी दृष्टि और अनुभव से दिए हैं। यदि अनुमति दें, तो उन्हें स्पष्ट कर दूँ।”
सेठ: “मेरे चार पुत्र हैं, यह भौतिक सत्य है। परंतु उनमें से केवल एक ऐसा है जो धर्माचरण करता है, मेरी बात मानता है, सत्संग में जाता है, सेवा करता है, और परिवार के मूल्यों को समझता है। शेष तीन पुत्र कुसंगति में हैं—आलस्य, अहंकार, और विषय-विकारों में डूबे हुए। वे न मेरी सुनते हैं, न किसी धर्म-संस्कार का पालन करते हैं।
महाराज, भले ही शरीर से कोई पुत्र हो, परंतु जो आत्मिक रूप से जुड़ा न हो, उसका कोई वास्तविक संबंध नहीं।
मेरी दृष्टि में वही एक पुत्र है, जो मेरी आत्मा के निकट है।”
सेठ: “महाराज, लोगों की दृष्टि में मैं लखपति हूँ। मेरे पास जमीनें, गहने, व्यापार सब हैं। परंतु यह सब तो माया है।
मैं अपने को केवल उस धन का स्वामी मानता हूँ, जिसे मैंने उपयोग में लाया—वो भी परमार्थ के लिए।
आज तक पच्चीस हज़ार रुपये मैंने दान, यज्ञ, गौसेवा, संतसेवा और समाजोपयोगी कार्यों में लगाए हैं।
बाकी जो धन है, वह मेरे बाद मेरे उत्तराधिकारी ले जाएंगे—उनका स्वामी मैं कैसे हुआ?
जो धन न मेरे साथ आया, न मेरे साथ जाएगा—उसे मैं कैसे अपना मानूँ
सेठ: “महाराज, मेरी वास्तविक आयु तब से प्रारंभ हुई जब मुझे आत्मज्ञान प्राप्त हुआ।
आज से चालीस वर्ष पूर्व मैं एक महापुरुष की संगति में गया। वहीं से मेरा जीवन बदला—मैंने भजन, सेवा, धर्म, और साधना का मार्ग अपनाया।
उससे पूर्व का जीवन केवल देहगत अस्तित्व था। मैं उसे ‘जिंदा रहना’ तो कह सकता हूँ, ‘जीवन’ नहीं।
इसलिए मेरी दृष्टि में मेरी वास्तविक आयु चालीस वर्ष है—चैतन्य जीवन की अवधि।”
महात्मा जी ने यह सुनकर गंभीर स्वर में कहा:
“सेठ जी, आप ने बहुत ही गूढ़ उत्तर दिए हैं। यह दृष्टिकोण ही धर्म है।
जो जीवन भोग में बीत गया, वह व्यर्थ है;
जो धन परमार्थ में नहीं लगा, वह भार है;
और जो संतान मूल्यहीन है, वह केवल नाम मात्र का संबंध है।
आपकी यह सूझबूझ स्वयं एक साधना है।”
निष्कर्ष:
इस कथा के माध्यम से तीन प्रमुख जीवनमूल्य उद्घाटित होते हैं:
- सच्ची संतान वही है, जो कर्तव्यनिष्ठ हो, मूल्यों से जुड़ी हो, और सेवा में तत्पर हो।
- संपत्ति वही है, जो धर्म और परमार्थ में प्रयुक्त हो। संचय केवल संग्रह है, संपत्ति नहीं।
- जीवन वही है, जो आत्म-चेतना और साधना से जुड़ा हो। कालगणना से नहीं, चेतना से जीवन का मूल्यांकन होता है।
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