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Showing posts from May, 2025

जीवन का अनमोल पाठ

🌿   जीवन का अनमोल पाठ — एक गुरु और उसके शिष्यों की कथा — बहुत पुरानी बात है। एक शांत, हरे-भरे जंगल के बीचों-बीच एक आश्रम था — गुरु शारदानंद जी का आश्रम। वहाँ दूर-दूर से बच्चे शिक्षा लेने आते थे। गुरुजी का आश्रम सिर्फ पढ़ाई का स्थान नहीं था, वहाँ जीवन जीने की कला सिखाई जाती थी। उस दिन की सुबह कुछ अलग थी। सूरज की किरणें जैसे धीरे-धीरे धरती को जगाने आई हों। पक्षियों की चहचहाहट वातावरण में संगीत घोल रही थी। मगर आश्रम के भीतर… एक अजीब सी शांति थी। शिष्य रोज़ की तरह अपने आसनों पर बैठे थे, पर आज गुरुजी के चेहरे पर कुछ अलग ही भाव थे — गंभीर, लेकिन प्रेमपूर्ण। गुरुजी ने अपने शिष्यों को देखा और बोले — गुरुजी (धीरे-धीरे): “बच्चों, आज हम न श्लोक पढ़ेंगे, न कोई ग्रंथ खोलेंगे। आज जीवन की वह शिक्षा दी जाएगी, जो न किताबों में मिलती है, न किसी पाठशाला में। यह पाठ तुम्हारे जीवन का रास्ता बदल सकता है।” सभी शिष्य चुपचाप गुरुजी को देखने लगे। कुछ के चेहरे पर जिज्ञासा थी, कुछ के मन में हलचल। तभी गुरुजी उठे और रसोई की ओर चल दिए। थोड़ी देर बाद वे तीन बर्तनों के साथ लौटे। पहले बर्तन में ए...

भाग्य और कर्म

भाग्य और कर्म (एक प्रेरक कथा) बहुत समय पहले, किसी शांत और हरे-भरे प्रदेश में, एक छोटा सा गांव बसा हुआ था। यह गांव अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए जाना जाता था, जहां खेत लहलहाते थे और नदियां कलकल करती थीं। हालांकि, आर्थिक रूप से गांव के लोग साधारण जीवन व्यतीत करते थे। इसी गांव के एक शांत कोने में, एक पुरानी और जर्जर कुटिया में, एक निर्धन ब्राह्मण, देवदत्त, अपने छोटे से परिवार के साथ रहता था। देवदत्त का जीवन अनेक कठिनाइयों से घिरा हुआ था। उनकी कुटिया की छत कई स्थानों से टपकती थी, भोजन के लिए पर्याप्त अन्न का अभाव था, और उनके पास पहनने के लिए भी फटे-पुराने वस्त्र ही थे। इसके बावजूद, देवदत्त के चेहरे पर हमेशा संतोष का भाव झलकता था। वह मानते थे कि जीवन की सबसे बड़ी संपत्ति आंतरिक शांति और ईश्वर के प्रति श्रद्धा है। देवदत्त का एक युवा पुत्र था, जिसका नाम व्रजेश था। व्रजेश ऊर्जा और उत्साह से भरपूर था। उसका शरीर सुगठित था और उसकी आँखों में एक स्वाभाविक चमक थी। दुर्भाग्यवश, उसके मन पर एक गहरा अंधविश्वास हावी था। "जो कुछ भी भाग्य में लिखा है, वही होकर रहेगा," यह व्रजेश का अटूट विश्वास था...

गंगा अवतरण की कथा

*गंगा अवतरण* बहुत प्राचीन काल की बात है, जब इक्ष्वाकु वंश के प्रतापी और न्यायप्रिय राजा सगर अपनी विस्तृत प्रजा पर धर्मानुसार शासन करते थे। वे न केवल एक पराक्रमी योद्धा थे, बल्कि एक दयालु और दूरदर्शी शासक भी थे, जिनकी कीर्ति चारों दिशाओं में फैली हुई थी। उनकी दो पत्नियाँ थीं - बड़ी रानी केशिनी, जो शांत, गंभीर और चिंतनशील स्वभाव की थीं, और छोटी रानी सुमति, जो चंचल, उदार हृदय वाली और सदैव प्रसन्न रहने वाली थीं। राजा सगर अपने विशाल साम्राज्य, अपार धन-धान्य और शक्तिशाली सेना के स्वामी होने के बावजूद एक गहरी चिंता से ग्रस्त थे - उनके कोई संतान नहीं थी। राजसिंहासन का उत्तराधिकारी कौन होगा, उनके यशस्वी कुल का नाम आगे कौन बढ़ाएगा, यह विचार उन्हें रात-दिन व्याकुल करता रहता था। एक दिन, रानियों ने आपस में इस विषय पर विचार-विमर्श किया और फिर अपनी यह हार्दिक इच्छा राजा के समक्ष व्यक्त करने का निश्चय किया। सबसे पहले, शांत स्वभाव की केशिनी ने राजा के एकांत में प्रवेश किया और विनम्रतापूर्वक कहा, “हे राजन, हमारे जीवन में संतान का सुख नहीं है। राजमहल सूना-सूना लगता है। हमारी भी प्रबल इच्छा है कि हमारी गो...