बरसाना में श्री गोस्वामी जी की लीला
बरसाना में श्री गोस्वामी जी की लीला
बरसाना की प्रेममयी गलियों में, जहाँ राधा रानी की मधुर स्मृतियाँ हर कण में रची-बसी हैं, एक शांत कुटिया में श्री वल्लभ गोस्वामी जी विराजमान थे। उनके हृदय में राधा माधव का अनमोल प्रेम हर पल प्रवाहित होता रहता था। उस दिन, उनके प्रिय शिष्य, रमन, अपनी स्वाभाविक वैरागी स्वभाव में मग्न थे। रमन, जिनके लिए हर वृक्ष कृष्ण का स्वरूप और हर भिक्षा प्रभु की कृपा थी।
परन्तु, जब उन्होंने अपने श्रद्धेय गुरुदेव, श्री वल्लभ गोस्वामी जी को अपनी कुटिया की ओर आते देखा, तो उनके सरल मन में एक अनोखी हलचल मच गई। उनके नेत्रों में गुरु के प्रति अपार सम्मान और हृदय में एक प्यारी सी उलझन समा गई।
रमन (स्वयं से): "अहो! यह कितना परम सौभाग्य है कि आज मेरे गुरुदेव मेरे इस निर्धन कुटिया को पवित्र करने आ रहे हैं! किन्तु... मेरे पास उन्हें बैठने के लिए एक साधारण आसन तक नहीं है। और भोजन... भोजन की तो बात ही क्या! हे गोविंद, अब मैं क्या करूँ? क्या मेरे गुरुदेव इस दीन सेवक की कुटिया में कुछ क्षण बिताएँगे भी?"
जब श्री वल्लभ गोस्वामी जी कुटिया के द्वार पर पहुँचे, तो उन्होंने रमन के चेहरे पर व्याप्त चिंता को तुरंत पहचान लिया। उनकी करुणामयी मुस्कान के साथ उन्होंने कहा,
वल्लभ गोस्वामी: "क्या बात है, रमन? तुम कुछ परेशान दिखाई दे रहे हो। सब ठीक तो है? क्या किसी बात की चिंता है?"
रमन ने तेज़ी से आगे बढ़कर अपने गुरु के चरणों की धूलि माथे पर लगाई और अत्यंत विनम्रता से कहा,
रमन: "गुरुदेव, सब ठीक कहाँ? आपके पावन चरण तो मेरे लिए किसी तीर्थ से कम नहीं, परन्तु... इस तुच्छ सेवक के पास आपको सादर अर्पित करने योग्य कुछ भी नहीं है। यह मेरा दुर्भाग्य है कि मैं आपकी उचित सेवा भी नहीं कर पा रहा हूँ। मेरी कुटिया भी कितनी साधारण है!"
वल्लभ गोस्वामी (प्रेमपूर्वक): "अरे मेरे भोले रमन! तुम तो मेरे अपने हो। एक साधु के लिए दो मधुर शब्द और थोड़ा सा जल भी पर्याप्त तृप्ति दे जाते हैं। व्यर्थ चिंता मत करो। यदि कुछ साधारण भोजन भी हो तो प्रेम से लाओ, वही मेरे लिए अमृत तुल्य होगा। और यह कुटिया तो प्रेम का धाम है, सादगी में ही सच्चा सौंदर्य है।"
जब रमन काँपते हाथों से कुछ सूखी रोटियाँ लेकर आए, तो उनकी आँखों में ग्लानि के आँसू झलक रहे थे।
रमन: "बाबा... ये कुछ दिन पुरानी रोटियाँ हैं। मेरे पास और कुछ भी नहीं है। मैं तो इन्हें जल में भिगोकर खा लेता हूँ... पर आपके लिए... क्या आप इसे स्वीकार करेंगे?" उनका कंठ अवरुद्ध हो गया।
वल्लभ गोस्वामी (हँसते हुए): "रमन! प्रेम से अर्पित की गई रूखी रोटी भी स्वादिष्ट व्यंजन के समान होती है। और यह तो प्रभु का आशीर्वाद है। इसमें संकोच कैसा? लाओ, यही मेरे लिए सर्वोत्तम है।"
पर रमन का व्याकुल मन अभी भी शांत नहीं हो रहा था।
रमन: "किन्तु बाबा... मेरा हृदय अशांत है। यदि मुझे थोड़ा समय मिलता, तो मैं अवश्य ही किसी ब्रजवासी के घर जाकर कुछ दूध और चावल माँग लाता और आपके लिए मधुर खीर बनाता। आपका तो मीठा भोजन प्रिय है। काश, मैं आपकी इच्छा पूरी कर पाता।"
वल्लभ गोस्वामी (अपनी आँखों में गहरा स्नेह भरकर): "रमन, तुम्हारा प्रेम ही मेरे लिए सबसे उत्तम भोजन है। तुम्हारे हृदय का शुद्ध भाव ही मेरे लिए सबसे बड़ा उपहार है। और देखो... प्रभु की इच्छा देखो..." तभी कुटिया के द्वार पर धीमी खटखटाहट हुई।
जब वह छोटी सी दिव्य बालिका खीर का कटोरा लेकर आई, तो रमन विस्मय से भर गए।
रमन (बालिका से): "छोटी बालिका, तुम कौन हो? इस आधी रात में तुम यहाँ क्या कर रही हो? और यह स्वादिष्ट खीर किसके लिए लाई हो?"
बालिका (सरल स्वर में): "मैं तो पास ही रहती हूँ, बाबा। मेरी माताजी ने यह खीर बनाई है और कहा है कि इसे कुटिया में रहने वाले बाबा को दे आओ। उन्होंने कहा कि बाबा भूखे होंगे।"
जैसे ही श्री वल्लभ गोस्वामी जी ने खीर के कटोरे को स्पर्श किया, उनकी आँखों से प्रेम की अविरल धारा बहने लगी। उनके होंठों पर एक मधुर मुस्कान फैल गई।
रमन (चिंतित होकर): "बाबा! क्या इस खीर में कुछ... कुछ ठीक नहीं है? आपकी आँखों में आँसू क्यों हैं?"
वल्लभ गोस्वामी (आश्चर्य और भक्ति से): "ठीक नहीं? नहीं रमन! यह तो... यह तो अद्भुत है! इसमें तो स्वयं किशोरी जी के प्रेम की सुगन्ध व्याप्त है। यह किसी साधारण मनुष्य के हाथों की बनी हुई खीर नहीं हो सकती। यह तो दिव्य प्रसाद है।"
जब मंदिर के पुजारी ने बताया कि श्रीजी को खीर का भोग लगाया गया था और वह चांदी का पात्र अदृश्य है, तो उनका आश्चर्य सीमा पार कर गया।
पुजारी: "यह... यह कैसे मुमकिन है? भोग का पात्र कहाँ जा सकता है? मंदिर के कपाट तो बंद थे। यह तो एक अलौकिक रहस्य है! क्या किसी ने उसे चुरा लिया?"
जब श्री वल्लभ गोस्वामी जी ने अपने वस्त्रों से वही चमकता हुआ चांदी का कटोरा निकाला, तो पुजारी अचंभित रह गए। उनकी वाणी स्तब्ध हो गई।
पुजारी: "हे भगवन! यह... यह तो वही पात्र है! बाबा, यह आपके पास कैसे आया? यह तो श्रीजी के चरणों में रखा था!"
वल्लभ गोस्वामी (गहरी कृतज्ञता और प्रेम से): "यह स्वयं किशोरी जी की असीम कृपा है, पुजारी जी! उन्होंने अपने भक्त के निश्छल प्रेम को स्वीकार किया और स्वयं चलकर उसे अपना प्रसाद दिया। यह साधारण खीर नहीं, स्वयं राधारानी का दिव्य प्रेम है! उन्होंने मेरे प्रेम के छोटे से संकल्प को पूर्ण किया।"
रमन (विस्मय और भक्ति से भरकर): "श्री राधे! श्री राधे!"
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कहानी का नैतिक संदेश:
इस दिव्य लीला से हमें यह शिक्षा मिलती है कि सच्ची भक्ति और निश्छल प्रेम का महत्व सबसे अधिक है। यदि भक्त का हृदय शुद्ध हो और उसकी भावना सच्ची हो, तो भगवान स्वयं उसकी छोटी से छोटी इच्छा को भी पूर्ण करते हैं। बाहरी आडंबर और भौतिक वस्तुओं का महत्व भक्ति में गौण है; मुख्य है तो केवल प्रेम और समर्पण का भाव। यह कहानी हमें यह भी सिखाती है कि भगवान अपने भक्तों की लाज रखते हैं और उनकी पुकार को अवश्य सुनते हैं, चाहे परिस्थितियाँ कितनी भी विपरीत क्यों न हों। प्रेम से की गई एक छोटी सी भेंट भी भगवान को उतनी ही प्रिय है जितना कि कोई बहुमूल्य अर्पण, यदि उसमें हृदय का सच्चा भाव मिला हो।
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