गंगा अवतरण की कथा
*गंगा अवतरण*
बहुत प्राचीन काल की बात है, जब इक्ष्वाकु वंश के प्रतापी और न्यायप्रिय राजा सगर अपनी विस्तृत प्रजा पर धर्मानुसार शासन करते थे। वे न केवल एक पराक्रमी योद्धा थे, बल्कि एक दयालु और दूरदर्शी शासक भी थे, जिनकी कीर्ति चारों दिशाओं में फैली हुई थी। उनकी दो पत्नियाँ थीं - बड़ी रानी केशिनी, जो शांत, गंभीर और चिंतनशील स्वभाव की थीं, और छोटी रानी सुमति, जो चंचल, उदार हृदय वाली और सदैव प्रसन्न रहने वाली थीं।
राजा सगर अपने विशाल साम्राज्य, अपार धन-धान्य और शक्तिशाली सेना के स्वामी होने के बावजूद एक गहरी चिंता से ग्रस्त थे - उनके कोई संतान नहीं थी। राजसिंहासन का उत्तराधिकारी कौन होगा, उनके यशस्वी कुल का नाम आगे कौन बढ़ाएगा, यह विचार उन्हें रात-दिन व्याकुल करता रहता था। एक दिन, रानियों ने आपस में इस विषय पर विचार-विमर्श किया और फिर अपनी यह हार्दिक इच्छा राजा के समक्ष व्यक्त करने का निश्चय किया।
सबसे पहले, शांत स्वभाव की केशिनी ने राजा के एकांत में प्रवेश किया और विनम्रतापूर्वक कहा, “हे राजन, हमारे जीवन में संतान का सुख नहीं है। राजमहल सूना-सूना लगता है। हमारी भी प्रबल इच्छा है कि हमारी गोद भरे और हम भी माता कहलाने का गौरव प्राप्त करें।” उनकी आँखों में पुत्रहीनता का दर्द स्पष्ट झलक रहा था।
कुछ समय बाद, चंचल और वाक्पटु सुमति भी राजा के पास पहुँची और अपनी भावनाओं को व्यक्त करते हुए बोलीं, “महाराज, हमारे हृदय में भी मातृत्व की मधुर कल्पना पलती है। कृपया कोई ऐसा उपाय कीजिए जिससे हमारे कुल में वृद्धि हो और हमें अपने पुत्रों का स्नेह और दुलार मिले। हम भी अपने बच्चों की किलकारियों से इस महल को गुंजायमान देखना चाहती हैं।”
राजा सगर अपनी प्रिय पत्नियों की यह व्याकुलता और उनके हृदय की गहरी पीड़ा देखकर द्रवित हो उठे। वे धर्मात्मा होने के कारण हर समस्या का समाधान धर्म और नीति के अनुसार खोजना चाहते थे। उन्होंने तुरंत अपने गुरु, परम ज्ञानी और तपस्वी और्व मुनि के पास जाने का निश्चय किया, जिनकी विद्वता और तपस्या की महिमा सर्वत्र विख्यात थी।
और्व मुनि एक शांत वन में अपनी कुटिया में निवास करते थे। राजा सगर ने मुनि के आश्रम पहुँचकर उनके चरणों में प्रणाम किया और अपनी व्यथा विस्तार से सुनाई। मुनि ने राजा की बातों को ध्यानपूर्वक सुना और फिर अपनी दिव्य दृष्टि से राजा के भविष्य को देखा। कुछ क्षण वे गहरी समाधि में लीन रहे, मानो ब्रह्मांड के रहस्यों को जान रहे हों। फिर उन्होंने गंभीर और रहस्यमयी वाणी में कहा, “हे राजन, तुम्हारी इच्छा अवश्य पूर्ण होगी। परंतु, विधि का विधान विचित्र और अप्रमेय है। तुम्हारी दोनों रानियों को पुत्र प्राप्त होंगे, लेकिन उनकी संख्या और भाग्य भिन्न-भिन्न होंगे। एक रानी केवल एक तेजस्वी पुत्र को जन्म देगी, जो अपने अद्वितीय गुणों और महान कर्मों से न केवल अपने कुल का नाम रोशन करेगा, बल्कि युगों-युगों तक स्मरण किया जाएगा। दूसरी रानी एक साथ साठ हजार पुत्रों को जन्म देगी, परंतु वे अल्पायु होंगे और उनका जीवन अनेक कष्टों से भरा रहेगा। अब तुम दोनों अपनी-अपनी इच्छा के अनुसार वरदान माँग लो।” मुनि के शब्द राजा और उनके भविष्य पर एक गहरा प्रश्नचिह्न छोड़ गए।
यह सुनकर केशिनी ने गहन विचार किया। वह एक ऐसे पुत्र की माता बनना चाहती थी जो न केवल उसका वंश चलाए, बल्कि अपने सद्गुणों से कुल का गौरव बने। उसने शांत मन से कहा, “हे मुनिवर, मेरी अभिलाषा है कि मुझे एक ही पुत्र प्राप्त हो, जो मेरे वंश को आगे बढ़ाए और अपनी कीर्ति से यशस्वी हो।”
वहीं, सुमति के हृदय में बहुत सारे पुत्रों की माता बनने की तीव्र इच्छा थी। उसने उत्साहपूर्वक कहा, “हे गुरुदेव, यदि संभव हो तो मुझे बहुत सारे पुत्र चाहिए, ताकि मेरा घर पुत्रों की हँसी-खुशी और उनकी चंचल क्रीड़ाओं से हमेशा भरा रहे।”
समय अपनी अविचल गति से आगे बढ़ता गया। कुछ समय पश्चात, केशिनी ने एक तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया, जिसका नाम असमञ्जस रखा गया। उसके जन्म से राजमहल में खुशियाँ छा गईं। वहीं, सुमति ने एक अद्भुत घटना को जन्म दिया - उसने एक साथ साठ हजार तेजस्वी पुत्रों को जन्म दिया, जिससे पूरे राज्य में आश्चर्य और उत्सुकता का माहौल बन गया। प्रजा इस अद्भुत घटना की चर्चा करने लगी।
असमञ्जस जैसे-जैसे बड़ा हुआ, उसका स्वभाव विचित्र और अप्रिय होता गया। वह क्रूर और निर्दयी बन गया। उसे निरीह प्राणियों और विशेषकर छोटे बच्चों को परेशान करने में असीम आनंद आता था। वह अक्सर उन्हें नदी में फेंक देता और बुरे कर्मों में लिप्त रहता। राजा सगर अपने ज्येष्ठ पुत्र के ऐसे निंदनीय आचरण से अत्यंत दुखी और चिंतित थे, लेकिन वे धैर्य धारण कर परिस्थिती को संभालने और उसे सन्मार्ग पर लाने का हर संभव प्रयास करते रहे। असमञ्जस के बुरे प्रभाव के कारण, राजा सगर के अन्य पुत्र भी धीरे-धीरे कुमार्ग पर चलने लगे, जिससे राजा का दुख और बढ़ गया। (यहाँ यह नैतिक शिक्षा मिलती है कि माता-पिता को अपने बच्चों के चरित्र निर्माण पर ध्यान देना चाहिए और बुरी संगति से बचाना चाहिए।)
समय चक्र घूमता रहा और असमञ्जस के घर एक धर्मात्मा और तेजस्वी पुत्र का जन्म हुआ, जिसका नाम अंशुमान रखा गया। अंशुमान अपने पिता के विपरीत अत्यंत सदाचारी, बुद्धिमान, विनम्र और सत्यनिष्ठ स्वभाव का था। उसे देखकर राजा सगर को कुछ शांति मिली और उन्हें अपने कुल में एक उज्जवल भविष्य की उम्मीद जगी। वे अंशुमान को देखकर सोचते, "शायद इस बालक से हमारे कुल का गौरव फिर से स्थापित होगा।" (यह दर्शाता है कि बुरे कुल में भी अच्छे व्यक्ति जन्म ले सकते हैं और परिवार का नाम रोशन कर सकते हैं।)
⸻
कुछ वर्षों बाद, जब राजा सगर ने अपने साम्राज्य की शक्ति और यश को और अधिक विस्तारित करने का विचार किया, तो उन्होंने अश्वमेध यज्ञ करने का निश्चय किया। यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रतिष्ठित यज्ञ था, जिसमें एक विशेष रूप से तैयार किया गया पवित्र घोड़ा स्वतंत्र रूप से विचरण करता था। जिस भी राज्य से वह घोड़ा निर्बाध रूप से गुजरता था, वहाँ के राजा या तो सगर की सर्वोपरिता को स्वीकार कर लेते थे या फिर उन्हें शक्तिशाली सगर की सेना से युद्ध करना पड़ता था।
यज्ञ की तैयारियाँ पूरे राज्य में धूमधाम से हुईं। विद्वान ब्राह्मणों को आमंत्रित किया गया, यज्ञशाला का निर्माण हुआ और सभी आवश्यक सामग्रियाँ एकत्रित की गईं। शुभ मुहूर्त में, राजा सगर ने स्वयं पवित्र मंत्रों के उच्चारण के साथ यज्ञ के घोड़े को छोड़ा। घोड़ा निर्भीक होकर पृथ्वी पर घूमने लगा, और कई छोटे-बड़े राजाओं ने सगर की अपार शक्ति को मानते हुए बिना किसी विरोध के उनकी अधीनता स्वीकार कर ली।
देवताओं के राजा इंद्र, जो राजा सगर के बढ़ते हुए यश और उनकी बढ़ती हुई शक्ति से गुप्त रूप से ईर्ष्या करने लगे थे, ने यज्ञ में विघ्न डालने की एक गुप्त योजना बनाई। वे नहीं चाहते थे कि कोई भी पृथ्वी का राजा देवताओं के समान शक्ति और प्रतिष्ठा प्राप्त करे। अपनी मायावी शक्ति का प्रयोग करते हुए, उन्होंने चुपके से यज्ञ के उस पवित्र घोड़े को चुरा लिया और उसे पाताल लोक में ले जाकर एक शांत और निर्जन स्थान पर, कपिल मुनि के गहरे ध्यान में लीन आश्रम के पास बाँध दिया। कपिल मुनि उस समय ब्रह्मांडीय चेतना में पूरी तरह से लीन थे, उन्हें बाहरी जगत का कोई भान नहीं था। (यह दर्शाता है कि ईर्ष्या और स्वार्थ दूसरों के कार्यों में बाधा डाल सकते हैं।)
जब यज्ञ का घोड़ा निर्धारित समय तक वापस नहीं लौटा, तो राजा सगर अत्यंत चिंतित हो उठे। उन्होंने तुरंत अपने साठ हजार पुत्रों को बुलाया और उन्हें कठोर स्वर में आदेश दिया, “हे मेरे पराक्रमी पुत्रो, जाओ और पूरी पृथ्वी के कोने-कोने में उस यज्ञ के घोड़े को खोजो। जहाँ कहीं भी वह मिले, उसे तुरंत वापस लेकर आओ। यह यज्ञ उस पवित्र घोड़े के बिना किसी भी प्रकार से पूर्ण नहीं हो सकता और यदि यह अधूरा रहा तो यह हमारे कुल के लिए अपयश का कारण बनेगा।”
पिता का आदेश पाकर सभी साठ हजार सगरपुत्र तुरंत पृथ्वी के चारों ओर घोड़े की खोज में निकल पड़े। उन्होंने हर वन, हर पर्वत और हर नगर को छान मारा, लेकिन उन्हें कहीं भी सफलता नहीं मिली। अंत में, थक-हारकर और निराश होकर, उन्होंने आपस में विचार-विमर्श किया और इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि वह पवित्र घोड़ा शायद पाताल लोक में ही छिपाया गया होगा।
अपने दृढ़ निश्चय के अनुसार, वे पृथ्वी को खोदने लगे। उन्होंने गहरी-गहरी खाइयाँ बनानी शुरू कर दीं, जिससे पृथ्वी का स्वरूप बदलने लगा। उनकी अथक खुदाई के कारण बड़े-बड़े गड्ढे बन गए, जो बाद में विशाल समुद्रों में परिवर्तित हो गए, और आज भी पृथ्वी पर विद्यमान हैं। उनके इस कार्य से पृथ्वी पर भारी उथल-पुथल मच गई। (यह दिखाता है कि बिना विचारे किया गया कार्य विनाशकारी परिणाम ला सकता है।)
अंततः, अपने अथक परिश्रम के बाद, वे पाताल लोक पहुँचे। वहाँ उन्हें एक शांत और पवित्र वातावरण दिखाई दिया - कपिल मुनि का दिव्य आश्रम। मुनि अपनी गहरी समाधि में लीन थे और यज्ञ का घोड़ा उनके आश्रम के पास ही एक वृक्ष से बंधा हुआ खड़ा था।
सगरपुत्रों ने उस पवित्र घोड़े को देखते ही अपना विवेक खो दिया। उन्होंने बिना किसी विचार और सम्मान के, कपिल मुनि की तपस्या और उनके शांत स्वरूप को अनदेखा करते हुए, उन पर चिल्लाना शुरू कर दिया, “यही चोर है! इसी दुष्ट ने हमारे यज्ञ का घोड़ा चुराया है। इसे पकड़ लो और बाँध दो ताकि यह भाग न सके!”
कुछ उद्दंड पुत्र तो मुनि को पकड़ने के लिए आगे भी बढ़े। लेकिन कपिल मुनि अपनी गहरी समाधि में इतने तल्लीन थे कि उन्हें इस अपमानजनक शोरगुल और धृष्टता का जरा भी आभास नहीं हुआ। जब सगरपुत्रों ने उन्हें पकड़ने की धृष्टता की और उनकी समाधि को भंग करने का प्रयास किया, तो उनकी वर्षों की तपस्या टूट गई।
कपिल मुनि ने अपनी समाधि टूटने से क्रोधित होकर अपनी दिव्य आँखें खोलीं और उन मूर्ख राजकुमारों को देखा। उनकी दृष्टि में प्रचंड तेज और क्रोध समाया हुआ था। उन्होंने कठोर वाणी में कहा, “मूर्खो! तुम बिना किसी सत्य को जाने और बिना किसी कारण के एक शांत तपस्वी और साधु पर आक्रमण करने का दुस्साहस कर रहे हो। अपने इस घोर अपराध और दुस्साहस का परिणाम तुम्हें अवश्य भोगना पड़ेगा।” (यह सिखाता है कि क्रोध और अज्ञानता विनाश का कारण बनते हैं। हमें दूसरों का सम्मान करना चाहिए और बिना सोचे-समझे किसी पर आरोप नहीं लगाना चाहिए।)
जैसे ही मुनि ने यह शाप दिया, उनकी आँखों से एक भयानक अग्नि निकली। उस अग्नि की प्रचंड ज्वाला में साठ हजार सगरपुत्र पल भर में जलकर राख के ढेर में बदल गए। पाताल लोक में हाहाकार मच गया। (यह कर्मों के फल की शक्ति को दर्शाता है। बुरे कर्मों का परिणाम बुरा ही होता है।)
⸻
जब राजा सगर के साठ हजार पराक्रमी पुत्र बहुत समय तक वापस नहीं लौटे, और कोई भी उनका समाचार लेकर नहीं आया, तो राजा अत्यंत व्याकुल और चिंतित हो उठे। उन्हें अनिष्ट की आशंका होने लगी। उन्होंने अपने बुद्धिमान और साहसी पौत्र, अंशुमान को बुलाया, जो न केवल शारीरिक रूप से बलवान था, बल्कि विवेक और समझदारी में भी अद्वितीय था।
राजा सगर ने अंशुमान से कहा, “हे वत्स अंशुमान! मेरे पुत्रों को गए हुए बहुत समय हो गया है और उनका कोई समाचार नहीं मिला है। तुम तुरंत पाताल लोक जाओ और पता लगाओ कि तुम्हारे चाचा कहाँ हैं और यज्ञ का घोड़ा किस स्थिति में है। सावधान रहना और किसी भी प्रकार का दुस्साहस मत करना। परिस्थितियों का ध्यानपूर्वक अवलोकन करना और बुद्धिमानी से कार्य करना।” (यह दिखाता है कि संकट की स्थिति में धैर्य और विवेक से काम लेना चाहिए।)
अंशुमान अपने दादा की आज्ञा का पालन करते हुए तुरंत पाताल लोक की ओर रवाना हुआ। वहाँ पहुँचकर उसने जो दृश्य देखा, वह अत्यंत भयावह और हृदयविदारक था। चारों ओर उसके चाचाओं की जली हुई राख के ढेर बिखरे पड़े थे और यज्ञ का पवित्र घोड़ा एक ओर बंधा हुआ खड़ा था। पास ही, परम तेजस्वी कपिल मुनि शांत भाव से गहरी तपस्या में लीन थे, मानो कुछ हुआ ही न हो।
अंशुमान ने उस भयानक दृश्य को देखकर क्षण भर के लिए शोक व्यक्त किया, लेकिन फिर अपने कर्तव्य को याद करते हुए, उसने विनम्रतापूर्वक दोनों हाथ जोड़कर कपिल मुनि को प्रणाम किया और मधुर तथा सम्मानजनक वाणी में कहा, “हे मुनिवर! यदि मेरे अज्ञानी पूर्वजों ने अपनी मूढ़ता के कारण कोई अपराध किया है, तो कृपया उन्हें क्षमा करें। मैं केवल यज्ञ का घोड़ा लेने आया हूँ ताकि मेरे दादा का महान यज्ञ पूर्ण हो सके।” (यह विनम्रता और समझदारी के महत्व को दर्शाता है। अंशुमान ने अपने पूर्वजों की गलती के लिए क्षमा माँगी और सम्मानपूर्वक अपनी बात रखी।)
कपिल मुनि ने अंशुमान की विनम्रता, सत्यनिष्ठा और शांत स्वभाव को देखकर प्रसन्न हुए। उन्होंने अपनी समाधि से नेत्र खोले और स्नेहपूर्वक कहा, “हे वत्स! तुम्हारे पूर्वजों ने अज्ञानतावश एक बड़ा अपराध किया है, जिसके कारण उन्हें यह दुखद अंत भोगना पड़ा। तुम यज्ञ का घोड़ा ले जा सकते हो। परंतु तुम्हारे पितरों का उद्धार तभी संभव होगा जब स्वर्ग की पवित्र नदी गंगा अपने दिव्य जल से उनकी राख को पवित्र करेगी। गंगा के स्पर्श के बिना उन्हें मुक्ति नहीं मिल सकती।” (यह बताता है कि किए गए बुरे कर्मों का प्रायश्चित आवश्यक होता है और पवित्रता मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करती है।)
यह सुनकर अंशुमान घोड़े को लेकर वापस लौट आए। उन्होंने अपने दादा राजा सगर को पाताल लोक का सारा वृत्तांत सुनाया। राजा सगर ने अपने पुत्रों के दुखद अंत को सुनकर गहरा शोक व्यक्त किया, लेकिन उन्हें कपिल मुनि के वचनों में आशा की एक किरण दिखाई दी कि गंगा के जल से ही उनके पुत्रों को मुक्ति मिल सकती है। उन्होंने उस यज्ञ को तो पूरा कर लिया, लेकिन अपने पुत्रों के उद्धार की चिंता उनके मन में सदैव बनी रही।
⸻
राजा सगर के बाद, अंशुमान धर्मात्मा और न्यायप्रिय शासक बने। उन्होंने अपने पूर्वजों के उद्धार के लिए गंगा को पृथ्वी पर लाने का दृढ़ संकल्प लिया। उन्होंने कई वर्षों तक कठोर तपस्या की, लेकिन उन्हें अपने प्रयास में सफलता नहीं मिली। गंगा का वेग इतना प्रचंड था कि उसे पृथ्वी पर लाना देवताओं के लिए भी एक कठिन कार्य था। (यह दिखाता है कि कुछ कार्य बहुत कठिन होते हैं और उनमें सफलता के लिए लंबे समय तक प्रयास करना पड़ता है।)
अंशुमान के तेजस्वी पुत्र दिलीप भी अपने पिता के समान पितृभक्त और धर्मात्मा थे। उन्होंने भी अपने पूर्वजों के उद्धार के लिए घोर तपस्या की, परंतु वे भी अपने महान प्रयास में सफल नहीं हो सके। गंगा को पृथ्वी पर लाने का कार्य अभी भी अधूरा था। (यह बताता है कि कभी-कभी हमारे प्रयास सफल नहीं होते, लेकिन हमें अपने कर्तव्य से विमुख नहीं होना चाहिए।)
अंत में, राजा दिलीप के पराक्रमी और दृढ़ निश्चयी पुत्र भगीरथ ने अपने पूर्वजों के उद्धार का भार अपने कंधों पर लिया। उन्होंने गंगा को पृथ्वी पर लाने के लिए अत्यंत कठिन और असाधारण तपस्या करने का निश्चय किया। वे हजारों वर्षों तक घोर तपस्या करते रहे। उन्होंने अन्न और जल त्याग दिया और केवल वायु पीकर जीवित रहे। उनकी तपस्या इतनी कठोर थी कि देवताओं के सिंहासन भी हिल गए और उन्हें चिंता होने लगी कि कहीं भगीरथ अपनी तपस्या से कोई अलौकिक शक्ति प्राप्त न कर लें। (यह दृढ़ संकल्प और कठिन परिश्रम के महत्व को दर्शाता है। भगीरथ ने अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए असाधारण त्याग किया।)
भगीरथ की अटूट श्रद्धा, दृढ़ संकल्प और वर्षों की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर अंततः सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी स्वयं प्रकट हुए। उन्होंने भगीरथ के तेजस्वी रूप को देखा और मधुर वाणी में कहा, “हे वत्स भगीरथ, तुम्हारी इस असाधारण तपस्या का क्या कारण है? तुम क्या चाहते हो? अपनी इच्छा मुझसे कहो, मैं उसे अवश्य पूर्ण करूँगा।”
भगीरथ ने ब्रह्मा जी के चरणों में प्रणाम किया और विनम्रतापूर्वक अपनी इच्छा व्यक्त करते हुए कहा, “हे पितामह! कृपा कर स्वर्ग की पवित्र गंगा नदी को पृथ्वी पर भेजिए ताकि मेरे पूर्वजों की राख गंगाजल से पवित्र हो सके और उन्हें मोक्ष की प्राप्ति हो। यही मेरे जीवन का एकमात्र उद्देश्य है।” (यह पूर्वजों के प्रति सम्मान और उनके उद्धार के महत्व को दर्शाता है।)
ब्रह्मा जी ने भगीरथ की पवित्र इच्छा सुनी और कहा, “हे राजकुमार, तुम्हारी इच्छा तो अत्यंत उत्तम और परोपकारी है, परंतु गंगा का वेग बहुत तीव्र है। जब वह स्वर्ग से पृथ्वी पर उतरेगी, तो उसकी प्रचंड धारा पृथ्वी को चीरकर रसातल में चली जाएगी और पूरी पृथ्वी नष्ट हो जाएगी। इसलिए, तुम्हें पहले भगवान शिव से प्रार्थना करनी होगी कि वे गंगा को अपनी जटाजूट में धारण करें। केवल उनकी दिव्य शक्ति ही गंगा के उस प्रचंड वेग को नियंत्रित कर सकती है।” (यह बताता है कि बड़ी समस्याओं का समाधान खोजने के लिए बुद्धि और सही मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है।)
भगीरथ ने ब्रह्मा जी के वचनों को सुना और तुरंत भगवान शिव की घोर तपस्या में लीन हो गए। उन्होंने एकाग्र मन से भगवान शिव की आराधना की। वे वर्षों तक एक ही स्थान पर खड़े होकर कठोर तपस्या करते रहे। उनकी तपस्या की अग्नि से तीनों लोक तपने लगे। अंततः, भगवान शिव भगीरथ की अद्भुत भक्ति और दृढ़ संकल्प से प्रसन्न हुए और अपने त्रिशूल के साथ प्रकट होकर बोले, “हे वत्स! तुम्हारी इस असाधारण तपस्या से मैं अत्यंत प्रसन्न हूँ। मैं गंगा के प्रचंड वेग को अपनी जटाओं में रोक लूँगा।”
जब स्वर्ग की पवित्र गंगा गर्व से इठलाती हुई पृथ्वी पर उतरीं, तो भगवान शिव ने अपनी घनी और उलझी हुई जटाओं को फैला दिया और गंगा की तीव्र धारा उनकी जटाओं में समाहित हो गई। गंगा का प्रचंड वेग उनकी जटाओं में उलझकर शांत हो गया, जैसे एक शक्तिशाली हाथी को जंजीरों से बाँध दिया गया हो। इसके बाद, भगवान शिव ने अपनी जटाओं से एक पतली और शांत धारा को पृथ्वी पर छोड़ दिया, जिससे गंगा नदी धीरे-धीरे और शांतिपूर्वक बहने लगीं। (यह भगवान शिव की करुणा और शक्ति को दर्शाता है, और यह भी कि बड़ी शक्ति को नियंत्रित किया जा सकता है।)
⸻
गंगा नदी आगे-आगे शांत भाव से बहती जा रही थीं और दृढ़ निश्चयी भगीरथ अपने रथ पर सवार होकर उनके पीछे-पीछे चल रहे थे, उन्हें उस स्थान तक पहुँचाने के लिए जहाँ उनके पूर्वजों की राख पड़ी थी। रास्ते में एक शांत और रमणीय स्थान पर जह्नु
Comments
Post a Comment