भाग्य और कर्म
भाग्य और कर्म
(एक प्रेरक कथा)
बहुत समय पहले, किसी शांत और हरे-भरे प्रदेश में, एक छोटा सा गांव बसा हुआ था। यह गांव अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए जाना जाता था, जहां खेत लहलहाते थे और नदियां कलकल करती थीं। हालांकि, आर्थिक रूप से गांव के लोग साधारण जीवन व्यतीत करते थे। इसी गांव के एक शांत कोने में, एक पुरानी और जर्जर कुटिया में, एक निर्धन ब्राह्मण, देवदत्त, अपने छोटे से परिवार के साथ रहता था।
देवदत्त का जीवन अनेक कठिनाइयों से घिरा हुआ था। उनकी कुटिया की छत कई स्थानों से टपकती थी, भोजन के लिए पर्याप्त अन्न का अभाव था, और उनके पास पहनने के लिए भी फटे-पुराने वस्त्र ही थे। इसके बावजूद, देवदत्त के चेहरे पर हमेशा संतोष का भाव झलकता था। वह मानते थे कि जीवन की सबसे बड़ी संपत्ति आंतरिक शांति और ईश्वर के प्रति श्रद्धा है।
देवदत्त का एक युवा पुत्र था, जिसका नाम व्रजेश था। व्रजेश ऊर्जा और उत्साह से भरपूर था। उसका शरीर सुगठित था और उसकी आँखों में एक स्वाभाविक चमक थी। दुर्भाग्यवश, उसके मन पर एक गहरा अंधविश्वास हावी था।
"जो कुछ भी भाग्य में लिखा है, वही होकर रहेगा," यह व्रजेश का अटूट विश्वास था, मानो यही उसके जीवन का एकमात्र मार्गदर्शक सिद्धांत हो।
दिन भर वह या तो गांव की संकरी गलियों में बिना किसी उद्देश्य के घूमता रहता, या फिर अपनी पुरानी चारपाई पर लेटा आकाश की ओर टकटकी लगाए रहता। खेतों में काम करने, किसी प्रकार का व्यापार करने, या यहां तक कि कुछ नया सीखने में भी उसकी जरा भी रुचि नहीं थी। गांव के अनुभवी बुजुर्ग उसे देखकर अक्सर निराशा से सिर हिलाते और आपस में कहते, "यह लड़का अपने भाग्य को बैठे-बैठे ढूंढ रहा है, पर उसे यह समझना होगा कि भाग्य तो कर्म रूपी हाथों की प्रतीक्षा करता है।"
देवदत्त की गहरी चिंता
एक रात, जब पूरा गांव गहरी नींद में सोया हुआ था, देवदत्त अपनी जीर्ण-शीर्ण कुटिया के बाहर एक टूटी हुई चौकी पर बैठे चांदनी रात में खोए हुए थे। उनके मन में अपने पुत्र के भविष्य को लेकर गहरी चिंता व्याप्त थी।
"यदि मैंने अब भी इसे कर्म का महत्व नहीं समझाया," वे स्वयं से फुसफुसाए, उनकी आवाज में निराशा झलक रही थी, "तो इसका पूरा जीवन निराशा और अभाव के अंधकार में डूब जाएगा।"
तभी, जैसे रात के अंधेरे में एक चमकती हुई किरण, एक विचार उनके मन में कौंध गया – "मुझे गांव के ज्ञानी और तपस्वी पुजारी, गुरुदेव हरिदास के पास जाना चाहिए और उनसे मार्गदर्शन प्राप्त करना चाहिए।"
अगली सुबह, जब सूर्य की पहली सुनहरी किरणें धरती पर पड़ रही थीं, देवदत्त ने व्रजेश को स्नेह से पुकारा।
देवदत्त: "वत्स, उठो और मेरे साथ चलो। आज मैं तुम्हें जीवन का एक महत्वपूर्ण पाठ सिखाऊंगा।"
व्रजेश ने अनिच्छा से करवट बदली और ऊबते हुए पूछा,
व्रजेश: "पिता जी, क्या आज फिर किसी साधु या महात्मा का उपदेश सुनना है? मेरा तो इन बातों से मन भर गया है।"
देवदत्त ने अपने पुत्र की नासमझी पर हल्की मुस्कान के साथ उत्तर दिया,
देवदत्त: "हां पुत्र, यह एक प्रकार का उपदेश ही होगा, लेकिन मुझे विश्वास है कि यह तुम्हारे जीवन की दिशा को हमेशा के लिए बदल देगा।"
मंदिर का शांत दृश्य
गांव की सीमा पर, घने और प्राचीन वटवृक्षों के बीच, एक पुराना शिव मंदिर स्थित था। यह मंदिर न केवल ऐतिहासिक महत्व रखता था, बल्कि पूरे क्षेत्र के लोगों के लिए शांति और भक्ति का एक पवित्र केंद्र भी था। मंदिर की पत्थर की दीवारों पर समय की परतें जमी हुई थीं, लेकिन इसके शांत गर्भगृह में प्रवेश करते ही एक अद्भुत आध्यात्मिक ऊर्जा का अनुभव होता था।
वहीं एक ऊँचे आसन पर विराजते थे – हरिदास पुजारी। श्वेत वस्त्रों में लिपटे, उनका शांत और गंभीर मुखमंडल ज्ञान और तपस्या का जीता-जागता प्रमाण था। उनकी आँखें गहरी और भेदक थीं, मानो वे किसी के भी अंतर्मन को पढ़ सकती हों।
देवदत्त ने गहरी श्रद्धा के साथ पुजारी जी के चरणों को स्पर्श किया। व्रजेश ने भी अनिच्छा से अपने हाथ जोड़े, उसके चेहरे पर अभी भी नींद और बोरियत के भाव थे।
देवदत्त ने विनम्रतापूर्वक अपने पुत्र की समस्या पुजारी जी के सामने रखी – व्रजेश का आलस्य, उसका भाग्य पर अटूट विश्वास, और कर्म के प्रति उसकी उदासीनता।
हरिदास जी ने ध्यानपूर्वक देवदत्त की बातें सुनीं, उनकी आँखों में सहानुभूति का भाव था। फिर वे शांत स्वर में बोले,
हरिदास पुजारी: "ब्राह्मणदेव, मैं आपकी चिंता समझ सकता हूं। आइए, पहले इस बालक का जन्मपत्र देख लेते हैं। ग्रहों का संदेश भी सुनना महत्वपूर्ण है।"
पुजारी जी ने एक प्राचीन और भारी पंचांग खोला, जिसके पृष्ठ पीले पड़ चुके थे। उन्होंने ध्यान से कुछ गणनाएं कीं, ज्योतिषीय ग्रंथों के पन्ने पलटे, और फिर कुछ क्षण गंभीर चिंतन में डूब गए। अंततः, उन्होंने अपनी गहरी आवाज में कहा,
हरिदास पुजारी: "इस बालक का भाग्य वास्तव में अद्भुत है, ठीक वैसे ही जैसे घने बादलों के पीछे छिपा हुआ एक तेजस्वी सूर्य। इसमें अपार संभावनाएं हैं। लेकिन, दुर्भाग्य से, एक अशुभ ग्रह इस समय इसके भाग्य में बाधा बनकर खड़ा है। यदि उचित साधना और सेवा की जाए, तो यह नकारात्मक प्रभाव शांत हो सकता है और सब कुछ शुभ होगा।"
व्रजेश यह सुनकर चौंक गया। उसे अचानक अपने भविष्य में एक उज्जवल संभावना दिखाई दी, एक उम्मीद की किरण जो अब तक उसके धुंधले विचारों में कहीं छिपी हुई थी।
व्रजेश: "गुरुदेव, कृपा करके मुझे बताइए न! वह क्या उपाय है जिससे मेरा भाग्य तुरंत चमक उठे? मैं अब और गरीबी और अभाव में नहीं जीना चाहता।"
हरिदास पुजारी ने स्नेहपूर्ण मुस्कान के साथ उत्तर दिया,
हरिदास पुजारी: "पुत्र, हमारे गांव को वर्षों से एक गंभीर जल संकट ने घेरा हुआ है। कुएं सूख गए हैं, और महिलाओं को दूर-दूर से पानी भरकर लाना पड़ता है। यदि तुम गांव के लिए एक नया और गहरा कुआँ खोद दो, जिससे हमारे सभी ग्रामवासियों को आसानी से स्वच्छ जल मिल सके, तो यह एक अत्यंत पुण्य का कार्य होगा। इस सेवा से तुम्हारे ग्रहों का नकारात्मक प्रभाव शांत होगा, और तुम्हारा सोया हुआ भाग्य निश्चित रूप से जागृत होगा।"
व्रजेश यह सुनकर थोड़ा ठिठक गया। कुआँ खोदने का विचार उसे बहुत कठिन और थकाऊ लगा।
व्रजेश: "कुआँ खोदना? लेकिन... वह तो बहुत ही मुश्किल काम है! इसमें तो बहुत अधिक शारीरिक परिश्रम और समय लगेगा! क्या कोई और सरल उपाय नहीं है, गुरुदेव?"
हरिदास पुजारी के चेहरे पर अब हल्की गंभीरता थी। उन्होंने व्रजेश की आँखों में सीधे देखते हुए कहा,
हरिदास पुजारी: "पुत्र, सदैव याद रखना – सरल मार्ग अक्सर क्षणिक सुख और प्रलोभन की ओर ले जाता है, जबकि कठिन मार्ग तपस्या और आत्म-अनुशासन की परीक्षा लेता है। केवल कठिन परिश्रम के मार्ग पर चलकर ही सच्चे और स्थायी फल की प्राप्ति होती है।"
देवदत्त ने अपने पुत्र का हाथ स्नेह से थाम लिया और उसे प्रेरित करते हुए कहा,
देवदत्त: "आओ पुत्र, चलो। आज हम अपने भाग्य को निष्क्रिय रूप से स्वीकार करने के बजाय, उसे कर्म के बल पर चुनौती देते हैं!"
कर्म का कठिन आरंभ
अगले ही दिन, देवदत्त और व्रजेश ने गांव के बाहरी इलाके में एक उपयुक्त स्थान चुना और अपने साधारण फावड़ों से मिट्टी खोदना शुरू कर दिया।
सूर्य की किरणें तेज थीं, और जल्द ही उनकी पीठ पसीने से भीग गई। उनके हाथों में छाले पड़ने लगे, और उनकी मांसपेशियां दर्द करने लगीं। गांव के कुछ लोग उन्हें देखकर हँसते और व्यंग्य करते –
"देखो तो, ये ब्राह्मण और उसका बेटा! खुद को राजा समझ बैठे हैं!"
"भाग्य के भरोसे बैठे रहने वाला अब कुआँ खोदेगा! यह तो सचमुच हास्यास्पद है!"
लेकिन देवदत्त और व्रजेश ने हार नहीं मानी। देवदत्त अपने पुत्र को प्रोत्साहित करते रहे, और व्रजेश, आश्चर्यजनक रूप से, धीरे-धीरे अपने आलस्य को त्याग रहा था। हर फावड़ा चलाने के साथ, उसके भीतर संकल्प की जड़ें मजबूत होती जा रही थीं। उसे पहली बार अपने हाथों से कुछ सार्थक करने का अनुभव हो रहा था।
दिन बीतते गए, और उनकी मेहनत जारी रही। एक दिन, जब दोपहर का सूरज ठीक उनके सिर के ऊपर था और व्रजेश का शरीर थकावट से बुरी तरह काँप रहा था, अचानक उसके फावड़े से एक कठोर वस्तु टकराई – ठक!
दोनों चौंक उठे। उन्होंने उत्साह से मिट्टी हटानी शुरू कर दी। धीरे-धीरे, एक बड़ा और पुराना मिट्टी का घड़ा दिखाई दिया, जो मिट्टी में दबा हुआ था। घड़ा सदियों पुराना लग रहा था, फिर भी उस पर कुछ चमक बाकी थी।
सत्य का दिव्य प्रकाश
सावधानीपूर्वक घड़े को मिट्टी से बाहर निकाला गया और उसे मंदिर ले जाया गया। यह खबर पूरे गांव में आग की तरह फैल गई, और मंदिर के चारों ओर उत्सुक लोगों की भीड़ जमा हो गई। पुजारी हरिदास जी भी आश्चर्य और उत्सुकता से भर उठे। उन्होंने धीरे से घड़े के ऊपर लिपटा हुआ पुराना कपड़ा हटाया – और फिर जो दृश्य सामने आया, वह किसी चमत्कार से कम नहीं था।
घड़ा प्राचीन सोने की मोहरों से लबालब भरा हुआ था – बहुमूल्य और चमकदार।
व्रजेश खुशी से चिल्ला उठा, उसकी सारी थकान पल भर में गायब हो गई।
व्रजेश: "पिता जी! देखिए! मैंने कहा था न कि मेरा भाग्य जागेगा! यह देखिए, भाग्य ने मुझे कितना धन दिया है!"
हरिदास पुजारी मुस्कुराए, उनकी आँखों में गहरी समझ का भाव था।
हरिदास पुजारी: "हाँ वत्स, तुम्हारा भाग्य जागा... पर यह कब हुआ?"
व्रजेश (कुछ पल चुप रहने के बाद): "...कर्म करने के बाद।"
हरिदास पुजारी ने अपनी शांत और गंभीर आवाज में कहा,
हरिदास पुजारी:
"जैसे उपजाऊ भूमि में बीज बोए बिना वृक्ष नहीं उगते,
जैसे कठोर चट्टानों को तोड़े बिना सोने का खनन नहीं होता,
वैसे ही बिना सच्चे कर्म किए भाग्य कभी स्वयं प्रकट नहीं होता।
वास्तव में, भाग्य भी प्रतीक्षा करता है –
तुम्हारे कर्म रूपी मशाल के जलने की।"
व्रजेश की आँखों से पश्चाताप और ज्ञान के आँसू बहने लगे। उसने पुजारी जी के चरणों में अपना सिर झुका दिया। उसी क्षण, उसने अपने हृदय में एक दृढ़ संकल्प लिया –
"अब से मेरा जीवन आलस्य और भाग्य के भरोसे नहीं रहेगा। अब मेरा जीवन कर्म की सच्ची आराधना बनेगा।"
एक नवजीवन का उदय
उस दिन के बाद व्रजेश एक नए व्यक्ति के रूप में उभरा। उसने आलस्य का पूरी तरह से त्याग कर दिया। वह सुबह जल्दी उठता और खेतों में कड़ी मेहनत करता। उसने नए वृक्ष लगाए और गांव के तालाब को गहरा करने में सक्रिय रूप से भाग लिया। धीरे-धीरे, उसकी मेहनत रंग लाई। उसके खेत पहले से अधिक उपज देने लगे, और गांव में खुशहाली की लहर दौड़ गई। जहां पहले लोग उसे आलसी कहकर ताने मारते थे, वहीं अब वे उसकी लगन और परिश्रम की प्रशंसा करते थे और उसे आशीर्वाद देते थे।
गांव के लोग अब आपस में कहने लगे –
"देखो, जहाँ व्रजेश की मेहनत की मिट्टी गिरी, वहाँ सोना उग आया!"
देवदत्त का हृदय अपने पुत्र के परिवर्तन को देखकर आनंद और गर्व से भर गया। हरिदास पुजारी मंद-मंद मुस्कुराते रहे – क्योंकि वे जानते थे कि एक और आत्मा ने कर्म के अनमोल महत्व को गहराई से समझ लिया है।
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शिक्षा
"भाग्य उसी का साथ देता है, जो अपने कर्म के दृढ़ संकल्प से उसे पुकारता है।
बिना सच्चे पुरुषार्थ के, सोया हुआ भाग्य कभी भी जागृत नहीं होता।"
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