अहंकार का विनाश: शेषनाग के पुत्र मणिनाग और गरुड़ की दिव्य गाथा
अहंकार का विनाश: शेषनाग के पुत्र मणिनाग और गरुड़ की दिव्य गाथा
यह कथा केवल एक कहानी नहीं, बल्कि एक शाश्वत सत्य का उद्घोष है: अहंकार विनाश का कारण है, और विनम्रता ही वास्तविक शक्ति का स्रोत है। यह बताती है कि चाहे कोई कितना भी बलवान, ज्ञानी या सामर्थ्यवान क्यों न हो, यदि अहंकार उसे ग्रस ले, तो पतन निश्चित है।
मणिनाग का तप और अभयत्व का वरदान
प्राचीन काल की बात है, शेषनाग के एक अत्यंत तेजस्वी और तपस्वी पुत्र थे – मणिनाग। उनके रोम-रोम में शिव-भक्ति रमी हुई थी। जन्म से ही बलशाली और ओजपूर्ण मणिनाग का हृदय महादेव के चरणों में अर्पित था। वर्षों तक उन्होंने कैलाश की दुर्गम कंदराओं में घोर तपस्या की, उनका ध्यान इतना गहरा था कि प्रकृति भी उनके तप के सम्मुख नतमस्तक थी। उनकी तपस्या की अग्नि से पर्वत शिखर दमक उठे।
एक दिन, भगवान शिव, जो अपने भक्तों के प्रति सहज करुणा से भरे रहते हैं, मणिनाग की भक्ति और तपस्या से अत्यंत प्रसन्न हुए। वे डमरू बजाते हुए प्रकट हुए, उनके मुख पर दिव्य मुस्कान थी।
"वत्स मणिनाग! तुम्हारी तपस्या और भक्ति ने मुझे परम प्रसन्न किया है। माँगों, क्या वर चाहते हो?" महादेव की गम्भीर वाणी कैलाश में गूँज उठी।
मणिनाग ने भक्तिभाव से नेत्र खोले, महादेव को सामने देख उनका हृदय गदगद हो उठा। वे हाथ जोड़कर बोले, "हे देवाधिदेव! आप तो त्रिकालदर्शी हैं, मेरे अंतर्मन की इच्छा जानते हैं। मैं गरुड़ के नैसर्गिक भय से मुक्त होना चाहता हूँ। कृपा कर मुझे ऐसा वर दें कि गरुड़ से मुझे कभी कोई भय न रहे।"
भगवान शिव ने सौम्यता से मुस्कराते हुए कहा, "तथास्तु! वत्स। गरुड़ से तुम्हें अब कोई भय नहीं रहेगा। तुम अभय हो।"
अहंकार की उड़ान और क्षीरसागर में स्वच्छंदता
वरदान पाकर मणिनाग का मन आनंद से भर उठा। भगवान शिव के वचन थे, अब भला कौन उन्हें रोक सकता था? उनके बल और तपस्या ने उन्हें यह अभयत्व प्रदान किया था। पर दुर्भाग्यवश, इस अभयत्व के साथ अहंकार का सूक्ष्म बीज भी उनके भीतर अंकुरित हो गया। उन्हें लगा, अब वे अजेय हैं, कोई उन्हें छू भी नहीं सकता।
इस नवजात अभिमान में भरकर, वे सीधे क्षीरसागर की ओर चल पड़े – वह पवित्र स्थान जहाँ भगवान विष्णु अपनी अर्धांगिनी लक्ष्मीजी के साथ अनंत शय्या पर विराजमान रहते हैं। क्षीरसागर की शांत और दिव्य आभा उन्हें अपनी ओर खींच रही थी। वहाँ पहुँचकर मणिनाग ने स्वयं को पूरी सृष्टि का स्वामी मान लिया। वे स्वच्छंदता से विचरण करने लगे, जैसे कोई सम्राट अपने ही राज्य में निर्भय घूम रहा हो, मानो यह पूरा ब्रह्मांड उनकी व्यक्तिगत क्रीड़ाभूमि हो।
गरुड़ का क्रोध और मणिनाग का बंधन
उधर, भगवान विष्णु के परम भक्त और वाहन, गरुड़, उस शांत वातावरण में एक नाग को इस प्रकार निर्भय विचरते देखकर विस्मित हो उठे। उनकी तेजस्वी आँखें क्रोध से लाल हो गईं।
"यह कौन है जो यहाँ इतनी धृष्टता दिखा रहा है?" गरुड़ के मन में विचार आया। "यह तो मेरी मर्यादा का उल्लंघन है! इस क्षीरसागर में मेरी अनुमति के बिना कोई नाग इस प्रकार स्वच्छंद नहीं घूम सकता।"
अपने नैसर्गिक बल और विष्णु के प्रति अपनी अनन्य निष्ठा के अभिमान में भरकर, गरुड़ ने बिना एक पल गंवाए, तीव्र वेग से मणिनाग पर झपट्टा मारा। इससे पहले कि मणिनाग कुछ समझ पाता, गरुड़ ने उसे अपने शक्तिशाली पाश में बाँध लिया। मणिनाग ने प्रतिकार का प्रयास किया, पर गरुड़ के बल के आगे वह टिक न सका। उसे क्षण भर में ही गरुड़ ने अपने निवास स्थान में बंदी बना लिया। शिव के वरदान के बावजूद, वह गरुड़ द्वारा बंदी बना लिया गया था – क्योंकि वरदान भय से मुक्ति का था, अहंकार से नहीं।
कैलाश में चिंता और नंदी का क्षीरसागर प्रस्थान
कैलाश में, कई दिन बीत गए थे, और मणिनाग भगवान शंकर के दर्शनार्थ नहीं आया था। भगवान के प्रमुख गण, नंदी, मणिनाग की अनुपस्थिति से चिंतित हो उठे। मणिनाग का प्रतिदिन भगवान के चरणों में शीश झुकाना उनका नियम था।
नंदी ने चिंतित स्वर में भगवान शिव से निवेदन किया, "हे देवाधिदेव! मणिनाग कई दिनों से आपके दर्शन को नहीं आया है। मेरा हृदय कह रहा है कि अवश्य ही वह गरुड़ द्वारा पकड़ा गया होगा या मारा गया होगा। अन्यथा वह भला क्यों न आता?"
भगवान शिव, जो सर्वज्ञ हैं और प्रत्येक प्राणी के कर्मों और नियति को जानते हैं, नंदी की चिंता पर मंद-मंद मुस्कुराए। उन्होंने शांतिपूर्वक कहा, "नंदिन्! मणिनाग गरुड़ के यहाँ बंदी बना हुआ है। तुम शीघ्र ही भगवान विष्णु के पास जाओ, मेरी ओर से मेरा संदेश दो और मणिनाग को छुड़ाकर लाओ।"
भगवान शिव की आज्ञा पाकर, नंदी तत्काल क्षीरसागर की ओर चल पड़े। उनके मन में अपने मित्र मणिनाग के प्रति चिंता थी, पर भगवान शिव की आज्ञा का पालन करने का दृढ़ संकल्प भी था।
नंदी की स्तुति और गरुड़ का अहंकारी प्रत्युत्तर
क्षीरसागर पहुँचकर, नंदी ने भगवान विष्णु की अत्यंत श्रद्धापूर्वक स्तुति की। उनके मुख से निकले प्रत्येक शब्द में भक्ति और विनम्रता का भाव था।
"हे जगत्पते! हे करुणासिंधु! आप संपूर्ण ब्रह्मांड के पालक हैं। मैं कैलाश से, देवों के देव महादेव का संदेश लेकर आया हूँ।"
भगवान विष्णु, जो भक्तों के प्रति दयालु हैं और नंदी की विनम्रता से प्रभावित हुए, उन्होंने अपनी पलकें खोलीं और शांत स्वर में कहा, "कहो, नंदिन्, क्या संदेश है?"
नंदी ने अत्यंत विनम्र भाव से भगवान शिव का संदेश निवेदित किया, "प्रभु! महादेव ने आग्रह किया है कि आप मणिनाग को मुक्त कर दें। वह आपके वाहन गरुड़ द्वारा बंदी बनाया गया है।"
भगवान विष्णु ने अपनी दिव्य दृष्टि गरुड़ की ओर डाली और शांत स्वर में आदेश दिया, "हे वैनतेय गरुड़! शंकरजी के आदेश से मणिनाग को मुक्त कर दो और उसे नंदी को सौंप दो।"
किंतु गरुड़ को यह आदेश स्वीकार नहीं था। उनके भीतर उठा अहंकार का ज्वार अब वाणी का रूप ले चुका था। उनकी आँखों में गर्व की चमक थी, और स्वर में तीखापन।
"हे प्रभु!" गरुड़ ने अविश्वसनीयता के साथ कहा, "मैं आपका सेवक हूँ! मैंने अपनी शक्ति और पराक्रम से इस नाग को पकड़ा है, और अब आप मुझे उसे छोड़ने को कह रहे हैं? क्या स्वामी अपने सेवकों से इस प्रकार व्यवहार करते हैं? आपके जितने भी विजय अभियान हैं, जितने भी असुरों का आपने संहार किया है, वे सब मेरे बल पर ही सफल हुए हैं! मैं ही महाबलवान हूँ! मेरे बिना आपकी गति क्या है?"
गरुड़ के इन गर्वपूर्ण और अहंकार भरे वचनों को सुनकर भगवान विष्णु के होठों पर एक रहस्यमयी मुस्कान तैर गई। वे जानते थे कि अब समय आ गया है इस परम भक्त के भीतर बैठे अभिमान को शांत करने का।
भगवान विष्णु का लघु भार और गरुड़ का पतन
भगवान विष्णु ने शांति से गरुड़ की ओर देखा, उनकी आँखों में असीम धैर्य था।
"हे पक्षिराज," उन्होंने अत्यंत सौम्यता से कहा, "लगता है मेरी सेवा करते-करते तुम कुछ दुर्बल हो गए हो। यदि तुम स्वयं को इतना बलशाली मानते हो, तो मेरी केवल कनिष्ठा अँगुली का भार वहन करो।"
भगवान विष्णु ने जैसे ही अपनी कोमल कनिष्ठा अंगुली गरुड़ के सिर पर रखी, उसी क्षण गरुड़ का संपूर्ण शरीर काँप उठा। यह केवल एक अँगुली का भार नहीं था, यह संपूर्ण ब्रह्मांड के धारक का भार था, जिसमें समस्त लोकों का बोझ समाहित था। गरुड़ का सिर धरती में धँसने लगा, उनकी विशाल काया सिकुड़ती प्रतीत हुई, कोख पैरों के मध्य जा छिपी। उनके शक्तिशाली अंग-प्रत्यंग चूर-चूर होते महसूस हुए, जैसे कोई विशाल चट्टान रेत में बदल रही हो। वह अद्वितीय बल, जिस पर वह गर्व करते थे, पलभर में नष्ट हो गया। उनका सारा अहंकार, पलक झपकते ही धूल में मिल गया।
गरुड़ व्याकुल हो उठे। उनके शरीर से पसीना बह रहा था, आँखों में आँसू थे, और स्वर में करुणा की चीख थी।
"हे जगन्नाथ! हे दयालु प्रभु!" गरुड़ व्याकुलता से गिड़गिड़ाते हुए बोले, "मुझे क्षमा करें। मैं मूढ़ता के वश अहंकार में अंधा हो गया था। मैंने अपनी सीमा लांघी। आप ही संपूर्ण ब्रह्मांड के धारक हैं, मैं तो केवल आपका एक नगण्य सेवक हूँ। मेरी क्या हस्ती है आपके सम्मुख? कृपा कर मुझे क्षमा करें, प्रभु! मैं अज्ञानी हूँ।"
माँ लक्ष्मी की करुणा और शिव की शरण
भगवान विष्णु की करुणा असीम है, पर इस समय उनकी अर्धांगिनी, माँ लक्ष्मी, भी इस हृदयविदारक दृश्य को देखकर करुणा से भर गईं।
"प्रभो!" माँ लक्ष्मी ने अत्यंत कोमल स्वर में निवेदन किया, "गरुड़ आपके सेवक हैं। वे भ्रमित हो गए थे। इन्हें क्षमा करें और इनकी रक्षा करें।"
भगवान विष्णु ने गरुड़ की विनम्रता और सच्चे पश्चाताप को देखा। उन्होंने अपनी कनिष्ठा अंगुली हटाई, और गरुड़ को पुनः उनके वास्तविक स्वरूप में लौटना महसूस हुआ।
"गरुड़!" भगवान विष्णु ने शांत स्वर में कहा, "अब तुम्हारा अहंकार नष्ट हो चुका है। परंतु तुम्हारा पूर्ण कल्याण और तुम्हारे बल की पुनः प्राप्ति भगवान शंकर की कृपा से ही संभव है। उनके पास जाओ और उनसे आशीर्वाद प्राप्त करो।"
कैलाश की यात्रा और गौतमी गंगा में स्नान
अब गरुड़, गर्वरहित होकर, मणिनाग और नंदी के साथ कैलाश की ओर चल पड़े। उनकी चाल में पहले जैसा वेग और अभिमान नहीं था, बल्कि एक नई विनम्रता और कृतज्ञता थी। भगवान शिव के दर्शन कर, गरुड़ ने नम्रतापूर्वक अपने अपराधों के लिए क्षमा याचना की।
भगवान शिव ने गरुड़ को क्षमा किया और निर्देश दिया, "हे गरुड़! तुम गौतमी गंगा में स्नान करो। उसके पवित्र जल से तुम्हारे शरीर का शुद्धिकरण होगा और तुम्हें तुम्हारा वास्तविक बल पुनः प्राप्त होगा।"
गरुड़ ने भगवान शिव के निर्देशानुसार गौतमी गंगा में स्नान किया। उस पुण्य स्नान से उनका शरीर पुनः वज्र-सा कठोर, तेजस्वी और पहले से भी अधिक वेगशील हो गया। उनका बल अब अहंकार से नहीं, बल्कि विनम्रता और ईश्वर के प्रति कृतज्ञता से ओतप्रोत था।
शाश्वत सीख
यह कथा हमें एक गहरा जीवन-संदेश देती है:
- बल और सामर्थ्य तभी शोभा पाते हैं, जब वे विनम्रता के साथ हों। अहंकार से भरा बल अस्थायी होता है और पतन की ओर ले जाता है।
- अहंकार चाहे देवताओं में भी हो, ईश्वर उसे सहन नहीं करते। वे उसे तोड़ने के लिए उचित मार्ग अपनाते हैं।
- विनीत भाव ही मनुष्य को ईश्वर के निकट ले जाता है और उसे वास्तविक शक्ति एवं शांति प्रदान करता है।
- सच्चा पश्चाताप और ईश्वर की शरण ही मुक्ति और पुनरुत्थान का मार्ग है।
यह कथा हमें सिखाती है कि हमारी सबसे बड़ी शक्ति हमारी विनम्रता में निहित है, न कि हमारे अभिमान में।
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