भगवान गणेश और बुढ़िया की खीर
भगवान गणेश और बुढ़िया की खीर: करुणा, भक्ति और विश्वास की एक अनुपम कथा
पुराने समय की बात है। सृष्टि के पालनहारों में से एक, विघ्नहर्ता भगवान गणेश जी ने एक दिन विचार किया कि क्यों न पृथ्वी लोक पर जाकर अपने भक्तों की भक्ति और करुणा की परीक्षा ली जाए। वे जानते थे कि मनुष्य अक्सर बाहरी आडंबरों में उलझ जाते हैं, और सच्ची श्रद्धा, सेवा और निस्वार्थ प्रेम की भावना कहीं खो सी जाती है। अतः उन्होंने एक अनूठी लीला रचने का निश्चय किया।
एक मोहक बालक का रूप धारण कर भगवान पृथ्वी पर अवतरित हुए। उनका स्वरूप ऐसा था कि कोई भी उन्हें देखकर मुग्ध हो जाए – छोटा-सा शरीर, माथे पर तेजस्वी तिलक, आंखों में दिव्यता का प्रकाश और मुख पर बालसुलभ, पवित्र मुस्कान। उनके हाथ में केवल एक चुटकी चावल और एक चम्मच दूध था – मात्र इतनी ही सामग्री, जिससे वे मनुष्यों की करुणा, सेवा भावना और सच्ची भक्ति की गहराई को मापना चाहते थे।
भक्तों की परीक्षा: निष्फल प्रयास और उपहास का सामना
गणेश जी रूपी वह बालक गांव-गांव भटकने लगा। प्रत्येक घर के द्वार पर जाकर वह विनम्रता से विनती करता, उसकी आवाज में एक मार्मिक पुकार थी:
“मां, क्या तुम इन थोड़े से चावल और दूध से मेरे लिए खीर बना सकती हो? मुझे बहुत भूख लगी है।”
पहले घर में, एक धनी व्यापारी की पत्नी ने बालक को देखा। वह रसोई के काम में व्यस्त थी और उसकी थाली में तरह-तरह के पकवान रखे थे। बालक की बात सुनते ही वह ठिठक गई।
“अरे बालक! यह क्या मजाक है? एक चुटकी चावल और एक चम्मच दूध से भला खीर बनती है कहीं? जाकर खेल, मुझे परेशान मत कर!” उसने बालक को झिड़क दिया।
अगले घर में, एक किसान ने, जो अपनी फसल की चिंता में डूबा था, बालक को देखा। बालक ने वही निवेदन दोहराया। किसान ने हँसते हुए कहा, “देख भाई, मेरे पास इतना फालतू समय नहीं है कि मैं तेरे ऐसे खेल में लगूं। अगर तुझे भूख लगी है तो कहीं और जा, मेरे पास देने को कुछ नहीं।” उसकी आँखों में केवल अपनी खेती का हिसाब था, दान का नहीं।
एक अन्य घर में, जहां कुछ स्त्रियां आपस में गपशप कर रही थीं, बालक पहुंचा। उन्होंने बालक की बात सुनी और एक स्त्री ने दूसरी से फुसफुसाते हुए कहा, “देखो तो इस बालक को! पागल लगता है। ऐसी कौन सी खीर बनती है भला?” दूसरी बोली, “शायद भूखा है, लेकिन ऐसे कौन मांगता है? कोई काम काज नहीं इसे।” उन्होंने बालक का उपहास किया और उसे अनदेखा कर दिया।
गणेश जी बालक रूप में हर गली, हर चौराहे पर घूमे, परंतु कहीं भी उन्हें सच्ची सेवा और करुणा की भावना नहीं मिली। उनका हृदय थोड़ी देर के लिए उदास हो गया — क्या अब पृथ्वी पर कोई सहृदय व्यक्ति नहीं बचा? क्या भक्ति केवल मंदिरों और अनुष्ठानों तक ही सीमित रह गई है? उन्होंने अनेक बार लोगों से आग्रह किया, "मैं भूखा हूँ, माँ! कृपया थोड़ी खीर बना दो!" लेकिन हर बार उन्हें उपेक्षा और तिरस्कार ही मिला।
करुणा की ज्योति: एक बुढ़िया की भक्ति और अटूट विश्वास
थके-हारे बालक जब एक छोटे से गांव के एकांत कोने में पहुंचे, तो उनकी दृष्टि एक टूटी-फूटी झोंपड़ी पर पड़ी। उस झोंपड़ी में एक वृद्धा रहती थी, जिसका नाम रूपा था। रूपा के जीवन में भौतिक सुख-सुविधाओं का अभाव था, परंतु उसका हृदय करुणा और ममता से परिपूर्ण था। जैसे ही उस वृद्धा ने बालक को देखा, उसका हृदय वात्सल्य से भर उठा। बालक की आँखों में मासूमियत और थकावट देखकर वह भावुक हो गई। उसकी ममता उमड़ पड़ी।
वह अपने सूखे गले से बोली, “आ जा बेटा, थका लग रहा है। अंदर आ। मेरे पास तो कुछ खास नहीं है, जो तुझे खिला सकूं, लेकिन तेरे लिए खीर जरूर बना दूंगी। जो कुछ भी है, मैं खुशी से दूंगी।” उसकी आवाज में वह ममता थी, जो बालक को पूरे गांव में कहीं नहीं मिली थी।
बालक ने जब उसे अपने हाथ में पकड़ी हुई एक चुटकी चावल और एक चम्मच दूध दिखाया, तो बुढ़िया एक पल के लिए चौंकी जरूर। इतनी थोड़ी सी सामग्री से भला कैसे खीर बन सकती है? उसने सोचा, 'क्या पता बालक ने कहीं से चुराया हो, या खेलने के लिए इकट्ठा किया हो। पर जो भी हो, भूखा तो है।' उसकी ममता और सेवा भावना में कोई बाधा नहीं आई। उसने तुरंत बालक को अपने पास बिठाया और मुस्कुराते हुए बोली, “ठीक है बेटा, मैं तेरे मन की खीर बना दूंगी। भगवान का नाम लेकर शुरुआत करते हैं, उन्हीं की कृपा से सब संभव है।”
वह एक छोटी कटोरी में चावल-दूध डालने लगी, तभी बालक ने कहा, “मां, यह बर्तन बहुत छोटा है, कोई बड़ा बर्तन लाओ। इसमें नहीं बनेगा।”
बुढ़िया फिर मुस्कुराई। उसकी आँखों में चमक थी। उसने सोचा, 'यह बालक कितना भोला है! शायद इसे खेलने में मजा आ रहा है।' वह प्यार से बोली, “तू कहेगा तो मैं अपना पूरा घर भी तेरे लिए ले आऊं, बेटा। भला एक खीर के लिए मैं क्यों न बड़ा बर्तन लाऊं!”
वह एक बड़ा बर्तन ले आई। बालक ने उसमें चावल-दूध डाला – और आश्चर्य! देखते ही देखते वह बड़ा बर्तन भर गया, लेकिन चावल और दूध की मात्रा वैसी की वैसी रही, जरा भी कम नहीं हुई! बुढ़िया की आँखें आश्चर्य और भक्ति से भर उठीं। उसने सोचा, 'यह तो कोई चमत्कार है!' उसने एक और बर्तन लिया, फिर एक और, और एक के बाद एक सारे बर्तन खीर से भरते गए, परंतु चावल और दूध की मात्रा वैसी की वैसी रही। बुढ़िया समझ गई – यह कोई साधारण बालक नहीं हो सकता! यह कोई दैवीय शक्ति है जो उसकी परीक्षा ले रही है। उसके मन में विश्वास और श्रद्धा और भी गहरी हो गई।
भक्ति का पुरस्कार: समृद्धि और साक्षात् दर्शन
बालक ने अब बुढ़िया से कहा, “मां, अब तू इस खीर को चूल्हे पर चढ़ा दे और सारे गांव में जाकर सबको भोजन का निमंत्रण दे। कोई भी भूखा न रहे। जब खीर बन जाए तो मुझे भी बुला लेना।”
बुढ़िया ने बिना किसी संकोच या प्रश्न के, बालक की आज्ञा का पालन किया। उसने तुरंत खीर को चूल्हे पर चढ़ाया, और फिर घर-घर जाकर सभी गांववालों को खीर खाने का निमंत्रण दिया।
वह पहले उसी व्यापारी के घर गई जिसने बालक को झिड़का था। “बहन, मेरे घर खीर बनी है, भोजन करने आओ।”
व्यापारी की पत्नी ने नाक सिकोड़ते हुए कहा, “तुम्हारे घर खीर? भला तुम्हारे पास क्या है जो इतनी खीर बनेगी? मैं नहीं आती।”
रूपा ने विनम्रता से कहा, “बस आ जाओ बहन, भगवान की कृपा से बहुत है।”
फिर वह किसान के घर गई। “भाई, खीर बनी है, खाने आओ।”
किसान ने उपहास करते हुए कहा, “क्या बुढ़िया, मजाक कर रही हो? तुम्हारे पास तो खाने को रोटी नहीं, खीर कहाँ से बनी?”
रूपा ने बस मुस्कुरा दिया, “विश्वास रखो, भाई, आ जाओ।”
गांव वाले चकित थे कि यह गरीब बुढ़िया इतनी खीर कहाँ से लाई। कुछ उत्सुकतावश आए, कुछ रूपा की विनम्रता से प्रभावित होकर। लेकिन जब वे आए और खीर खाई, तो वे और भी हैरान रह गए – खीर इतनी स्वादिष्ट थी कि सभी खाते रहे, खाते रहे, पर खीर फिर भी खत्म नहीं हुई! खीर का स्वाद अलौकिक था, मानो स्वयं अमृत हो। गांव के पंडित जी भी खीर खाकर दंग रह गए। उन्होंने कहा, “रूपा, यह खीर किसी मनुष्य द्वारा नहीं बनाई गई है। यह अवश्य किसी दैवीय शक्ति का प्रसाद है।”
सभी के भोजन करने के बाद भी जब खीर बची रह गई, तो बुढ़िया ने बालक से पूछा, “बेटा, अब मैं इस बची हुई खीर का क्या करूं? इतनी खीर तो मेरे जीवन में कभी नहीं बनी।”
बालक ने मुस्कुराते हुए कहा, “इस खीर को चारों दिशाओं के कोनों में, बर्तन सहित उलटकर ढक दे और सुबह तक वैसे ही रहने दे। किसी भी बर्तन को मत उठाना।”
बुढ़िया ने वही किया, जो बालक ने कहा था। रात भर वह सोचती रही कि सुबह क्या होगा। अगली सुबह जब उसने बालक की आज्ञा मानकर बर्तन उठाए, तो उसकी आंखें खुली की खुली रह गईं – हर बर्तन में हीरे, मोती, सोने के आभूषण और बहुमूल्य रत्न भरे हुए थे! उसकी टूटी-फूटी झोंपड़ी एक ही रात में स्वर्ण महल में बदल गई थी, चमकते रत्नों से सुसज्जित!
तभी बालक प्रकट हुए अपने दिव्य रूप में – हाथ में मोदक, मस्तक पर मुकुट, और चार भुजाएं, जो सभी प्राणियों पर आशीर्वाद बरसाती हैं। यह स्वयं भगवान गणेश थे! बुढ़िया उनके चरणों में गिर पड़ी, उसकी आँखों से भक्ति के अश्रु बह रहे थे।
गणेश जी ने उसे उठाया और प्रेम से बोले, “मां रूपा, तूने मुझे पहचान न पाने पर भी मुझ पर असीम प्रेम और करुणा दिखाई। तेरे हृदय में वास करने वाली यही सच्ची भक्ति है। तूने निस्वार्थ भाव से सेवा की, और मैं अपने भक्तों की सच्चे मन से की गई सेवा को कभी व्यर्थ नहीं जाने देता। तेरी करुणा और विश्वास ने ही तुझे यह फल दिया है।”
ग्रामवासी जो दूर से यह सब देख रहे थे, वे भय और आश्चर्य से भर गए। जिन्होंने बालक को दुत्कारा था, वे लज्जित हुए। पंडित जी ने घोषणा की, “यह वही भगवान गणेश हैं, जिन्होंने अपनी लीला से हमें सच्ची भक्ति का मार्ग दिखाया है!”
कथा का लोककथाओं में स्थान और शिक्षा
इस घटना के बाद, उस गांव का नाम 'रूपा नगरी' पड़ गया, और बुढ़िया रूपा को 'रूपा माँ' के नाम से जाना जाने लगा। उसकी झोंपड़ी जहां थी, वहाँ एक भव्य गणेश मंदिर का निर्माण हुआ, और उस स्थान पर हर वर्ष एक विशाल मेला लगने लगा। यह कथा पीढ़ियों तक सुनाई जाने लगी, एक प्रेरणा के रूप में।
यह अनुपम कथा हमें जीवन के कई महत्वपूर्ण और अमूल्य पाठ सिखाती है:
- भक्ति का वास्तविक अर्थ: भक्ति केवल पूजा-पाठ, अनुष्ठानों या मंदिर जाने तक ही सीमित नहीं है। सच्ची भक्ति तो सेवा, करुणा, दया, और नि:स्वार्थ भाव में निहित है। जब हम किसी दुखी, भूखे या जरूरतमंद की सहायता करते हैं, तो हम वास्तव में ईश्वर की ही सेवा करते हैं। यह कथा हमें याद दिलाती है कि 'मन चंगा तो कठौती में गंगा' – यानी, अगर मन में पवित्रता है तो किसी भी साधन से ईश्वर को पाया जा सकता है।
- ईश्वर की सर्वव्यापकता: भगवान केवल मंदिरों की मूर्तियों या पवित्र स्थानों तक ही सीमित नहीं हैं। वे हर भूखे, प्यासे, दुखी, और असहाय प्राणी में वास करते हैं। जब हम उन प्राणियों की सेवा करते हैं, तो हम सीधे ईश्वर की सेवा करते हैं।
- विश्वास की शक्ति: थोड़ा बहुत जो हमारे पास है, यदि हम उसे सच्चे मन से, निस्वार्थ भाव से दूसरों के साथ बांटते हैं, तो ईश्वर उसे अनंत बना सकते हैं। बुढ़िया के पास भले ही कुछ न था, लेकिन उसके अटूट विश्वास और सेवा भावना ने उसे अतुलनीय धन और भगवान का साक्षात् दर्शन करवाया।
- करुणा और दान का महत्व: यह कथा हमें सिखाती है कि हमारी संपत्ति या सामर्थ्य चाहे कितनी भी कम क्यों न हो, यदि हमारे हृदय में करुणा और दान की भावना है, तो हम बहुत कुछ कर सकते हैं। एक चुटकी चावल और एक चम्मच दूध, जिसे दुनिया ने ठुकरा दिया, उसी से भगवान ने अपनी लीला रची और एक वृद्धा को मोक्ष दिलाया।
समापन मंत्र
यह कथा हमें प्रेरणा देती है कि हम अपने जीवन में सच्ची भक्ति और करुणा को अपनाएं। जब हम दूसरों की सेवा करते हैं, तो हम केवल उनकी मदद नहीं करते, बल्कि अपने भीतर के ईश्वर को भी जागृत करते हैं। क्या आप भी अपने आसपास किसी जरूरतमंद की मदद करके सच्ची भक्ति का अनुभव करना चाहेंगे?
🙏 बोलो श्री गणेश जी महाराज की जय!
🙏 जय सच्ची भक्ति की, जय सेवा की, जय विश्वास की!
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